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बंगाल की शेरनी मछली बन कांटे में क्यों फंसी .....

April 02, 2021 02:17 PM

बसंत पांडे

ममता बनर्जी को चाहने वाला हर कोई हतप्रभ है। ममता का 'खेला होबे' का नारा गूंज के साथ उछल रहा था। लग रहा था कि वे सामने खड़े विपक्षी को ललकार रही हैं और उनकी ललकार में करोड़ों चाहने वालों की भावनाएं भी शामिल हैं। पर अचानक से हवा जैसे बदलने लगी। लगने लगा कि ममता अपनी आक्रामकता में बचाव को ला रही हैं। वे बीजेपी के हिंदू कार्ड के 'ट्रैप' में फंसती जा रही हैं। हर कोई आहत हुआ जब उन्होंने 'चण्डी पाठ' किया, जब उन्होंने अपने गोत्र का ऐलान किया। 'बंगाल की शेरनी' को अपने किये का हिसाब देना था, उन्हें भाजपा में एक एक कर गये उनके सिपहसालारों के भ्रष्टाचार को उखाड़ना था, उन्हें बीजेपी की तमाम सरकारों की विफलताओं की कहानी बतानी और पूछनी थी, उन्हें मोदी के सात सालों के झूठों को सामने लाना और सात सालों का हिसाब मांगना था। ममता भूल गयीं थीं कि मोदी यही नहीं चाहते थे। बीजेपी का कोई सदस्य कभी नहीं चाहता कि पिछले सात सालों पर बात हो। इसीलिए बड़ी चतुराई और बेशर्मी से उन्होंने हर चुनाव में अपना जाल बुना। बहुसंख्यक हिंदू का कार्ड और मुस्लिम तुष्टिकरण जैसी बातें। बीजेपी के इस जाल में कौन नहीं फंसा। लेकिन हर किसी को विश्वास था कि ममता राहुल, अखिलेश यादव, लालू या तेजस्वी यादव, केजरीवाल और ऐसे ही विपक्षी नेताओं से अलग हैं। 34 साल के वामपंथियों के किले को ढहाने वाली ममता सामान्य तो नहीं हो सकतीं। इसीलिए पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपना एक विश्लेषण सिर्फ इस बात पर टिकाया कि यदि ममता हार गयीं तो फिर विपक्ष के मायने ही क्या हैं। लाजवाब विश्लेषण ने ममता को सुनने वालों के दिमागों में ममता को स्थापित किया ।लेकिन ठीक उसी वक्त ममता कुछ ऐसा कर रही थीं जो लोगों के बीच निराशा पैदा कर रहा था। वे बता रही थीं कि वे कितनी ज्यादा हिंदू हैं। वे भाजपा या मोदी के जाल में फंसी हुईं मछली जैसी सामान्य सी दिख रही थीं। ममता जब कभी आगे अपनी इस भूमिका पर चिंतन करेंगी तो इस भूल पर पछतावा होगा। ममता समझ नहीं पा रही थीं कि वे अनचाहे ही बीजेपी को मजबूत करती हुईं उसी की बनाई पिच पर आ गयी हैं।
बंगाल के चुनावों से उभरी एक बहस पर 'सत्य हिंदी' में आशुतोष ने एक बेहद रोचक कार्यक्रम बनाया। वह रोचक शायद न बन पड़ता यदि उसमें अनिल त्यागी जैसे लोग शिरकत न करते।पत्रकार अनिल त्यागी 'जी फाइल्स इंडिया' के संपादक हैं। पूरी बहस में अनिल त्यागी और आलोक जोशी को सुनना दिलचस्प रहा। आलोक जोशी ने बहुत सही कहा कि आज वैचारिक और बौद्धिक विचारधारा का दिवालियापन है। आज कार्ड हैं, ट्रिक्स हैं, दांव हैं, पेंच हैं। कौन सा जुमला और कौन सा नारा कब चल जाए। जोशी ने कहा नये अंदाज की 'ईस्ट इंडिया कं' देश में आ रही हैं। अनिल त्यागी की बातें तो और भी दिलचस्प, दो टूक और वर्तमान के बहुत निकट की थीं। सुनिए, उनका मानना है कि आज की राजनीति अगले पचास साल की हो रही है, आज चुनाव का बाजारवाद है, देश संविधान की खिड़की से कूद गया है, संविधान से दो शब्द बड़ी जल्दी निकाले जाएंगे - 'सेक्युलर और सोशलिज्म'। उन्होंने एक और बात कही स्थितियां कुछ बदल सकतीं हैं अगर दलित खुद को हिंदुओं की श्रेणी से अलग कर ले या खुद को हिंदू कहना बंद कर दे। इसी के बरक्स एक कार्यक्रम आलोक जोशी ने लिया जिसमें शेष नारायण सिंह ने जो कुछ कहा और इधर उर्मिलेश जी ने जो कुछ कहा वे बुर्जुआ समझ से निकल रहे अवसाद की अभिव्यक्तियां जैसी ज्यादा हैं। इसीलिए त्यागी जी को कहना पड़ा कि आप लोग पिछले पचास साठ सालों की सोच में अभी तक बंधे हैं।
सच बात यही जान पड़ती है जिसे अनिल त्यागी जैसे लोग व्यक्त कर रहे हैं। कोई विचार नहीं, कोई मुद्दा नहीं। सारी संस्थाओं को, सारे मीडिया को, जजों को, कारपोरेट को मुठ्ठी में जकड़ कर आईटी सेल के जरिए पूरे देश में चौसर बिछाने का खेल जब चल रहा हो और हमारा बुद्धिजीवी वर्ग उसे भांप तक न पाये तो आप क्या कीजिएगा। यही नहीं 2014 या उससे पहले तो प्रताप भानु मेहता, आशीष वार्ष्णेय और रामचंद्र गुहा जैसों ने तो मोदी को फासिस्ट तक मानने से इंकार कर दिया था। तवलीन सिंह और मधु किश्वर जैसे पत्रकारों ने मोदी के कसीदे पढ़े थे। मधु तो आज भी इसी काम में लगी हैं जबकि कभी वे पक्की समाजवादी विचार की थीं। कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना भर है कि जब चौसर बिछाने का षड्यंत्र रचा जा रहा था तब हम खाम खयाली में थे। आज भी देखिए क्या हो रहा है। कहीं कोई वास्तविक विश्लेषण आपको नजर नहीं आएगा। ऐसा कभी नहीं हुआ, पहले ऐसा होता था, पहले के नेता इस प्रकार के होते थे फिर ऐसा बदलाव आया। बस ऐसे ही विचारों के इर्दगिर्द सब कुछ ठहर कर रह गया है। प्रसून वाजपेयी भी जब अतीत के आंकड़े देते हैं तो फिल वक्त वे इसलिए बेमानी से लगते हैं क्योंकि यह सत्ता ऐसी सब चीजों को कालीन के नीचे दफन कर देना चाहती है। उर्मिलेश जी जैसे लोग आशावादी हैं। लेकिन उनका आशावाद इतना थका हुआ है कि विपक्ष के एक नेता को भी नहीं साध पाया। क्या बेहतर नहीं होता कि दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का एक प्रतिनिधिमण्डल बंगाल उसी तरह जाता जैसे किसान नेता गये और उन्होंने अपील की। बात ग्रासरूट स्तर के वोटर के अलावा मध्यवर्ग और श्रेष्ठी वर्ग के वोटर की भी है। कभी कभी संवाद बहुत निर्णायक होता है।
बाकी जो रिपोर्टर दिल्ली से बंगाल गये उनका प्रभाव कितना होगा वह पता चलेगा। संतोष भारतीय जी को चिंता है कि किसानों का विषय गौण हो रहा है। फिर भी वे निरंतर लगे हैं। पिछले रविवार अभय कुमार दुबे से तो उन्होंने बात की ही, जो बेहद लाभप्रद थी। इसके अलावा इस सप्ताह की एक अच्छी बातचीत पत्रकार शैलेष से भी रही। शैलेष भी खूब बोले और छक कर बोले।अमरीका से सतीश भाई के साथ भी उनकी बातचीत दिलचस्प हुआ करती है।
एनडीटीवी में रवीश लौट आये हैं छुट्टी से। मजे की बात लोगों की जिज्ञासा है उनके प्रति। कल रात ही कानपुर से एक सज्जन का फोन आया क्या बात है रवीश कई दिनों से नहीं आ रहे। मैंने कहा आज आएंगे टीवी पर बैठ जाइए। उनकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा जैसे। कमाल है यह भी।
अभी बंगाल में चुनाव चल रहे हैं। भाजपा अपने पूरे बेशर्म तेवर में है। चुनाव आयोग से कोई उम्मीद मत पालिए। सबसे बड़ी बेशर्मी तो तब देखने को मिलती है जब एक जगह वोट पड़ रहे हों और निकट के चुनावी क्षेत्र में मोदी जी की चुनावी रैली चल रही हो। वे क्या क्या कहते हैं आप सब जानते हैं। अभी ममता के पास वक्त है। देखें आगे का समय वे जीत में बदल सकतीं हैं या नहीं।
और अंत में, बंगाल में अकेले अकेले रात की थकान के साथ आरफा खानम शेरवानी का गोलगप्पे या बंगाली भाषा में पानीपुरी सुढ़कते हुए देखना पसंद आया। राजनीति तो अपनी रफ्तार से चलती ही रहती है। बस अंतर इतना है कि इस समय वह बदहवास सी भाग रही है।

('सत्य हिंदी' के सौजन्य से)

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