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सब कुछ बटोरने में लगे हैं, यही छोड़ जाने के लिए !

September 25, 2020 08:11 AM

डॉ कमलेश कली 

सब कुछ बटोरने में लगे हैं, यही छोड़ जाने के लिए, शुक्र है कि कफ़न में जेब नहीं होती ! यह एक कटु सत्य है कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ लौट जाता है और उससे भी बड़ा सत्य है कि यहां से देर सबेर सब ने चले जाना है, कोई भी यहां सदा रहने वाला नहीं है। लेकिन इस आपाधापी की दुनिया में येन केन प्राकरेण धन और दूसरे स्थूल साधनों को इकठ्ठा करने में हम इतने मशगूल हो गए हैं कि इस खतरनाक महामारी में भी लालच से,छलबल से, नैतिकता को तिलांजलि दे धन बटोरने में लगे हैं। अस्पतालों द्वारा इलाज के नाम पर की गई  लूट खसूट के बाद अब टेस्टिंग लैब्स द्वारा कोरोना जांच से संबंधित रिपोर्टस में गड़बड़ी का धंधा सामने आया है। ताज़ा मामला गुजरात में इन टेस्टिंग लैब्स से मनचाही रिपोर्ट प्राप्त करने का है, आप देश में  कहीं से भी ज्यादा पैसे देकर कोरोना टेस्ट, जैसे एंटीबॉडी टेस्ट, पीसीआर और आर टी रिपोर्ट नेगेटिव ले सकते हैं।पता चला है कि फ़ैक्टरी मालिक अपने मज़दूरों के लिए इस तरह की नेगेटिव रिपोर्ट खरीद रहे हैं ताकि उन्हें 14 दिन की मजदूरी नहीं देनी पड़े और मजदूर इस लिए नेगेटिव रिपोर्ट ले रहे हैं ताकि नये मालिक के पास काम मिल जाए।यह सब गड़बड़ी रुपए ले देकर की जा रही है। एक गरीब मजदूर की मजबूरी तो समझी जा सकती है, पर लैब मालिक, वहां काम करने वाले स्पेशलिस्ट और फैक्ट्री मालिकों की कौन सी मजबूरी है जो उन्हें इस तरह के खतरे, अपने लिए और समाज के लिए, चंद रुपयों के लिए मोल ले रहे हैं। संक्रमण का खतरा तो सबके लिए है, कोरोनावायरस भेद नहीं करता कि आप बहुत अमीर है या गरीब, बहुत ऊंची पोस्ट पर लगें हैं या बिलकुल निम्न पद पर है, आप बहुत नामी-गिरामी है या फिर आमजन,सब के लिए संकट एक जैसा है।यक्ष युधिष्ठिर संवाद में, सबसे जाना माना प्रश्न है कि इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर का सटीक जवाब था कि रोज़ रोज़ लोगों को मरते देखते हैं, फिर भी अपने मरने का कोई ख्याल नहीं आता कि हमने भी जाना है, मौत तो औरों को आती है,हम तो यहां सदा ही रहने वाले हैं। शायद यही वजह है कि कोरोना महामारी से लोगों को मरते देखते हुए भी, छल-कपट से इस संकट में भी पैसे बनाने के अवसर तलाश रहे हैं। मौत सब के सिर पर मंडरा रही है, फिर भी लोभ लालच, उचित अनुचित तरीके से लूट-खसोट करने में लगे हैं। 

गुजरातियों की धन कमाने और व्यवहार कुशलता से चांदी कूटने का गुण विश्व में प्रसिद्ध है, कितने ही उदाहरण सच्चे और झूठे सुनने में आते हैं। एक पुराना जोक इस संबंध में याद आ रहा है कि जब बिलगेटस ने माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ का कार्यभार छोड़ा तो नये प्रत्याशी के चयन के लिए सीधे इंटरव्यू का विज्ञापन दिया। शर्ते काफी कड़ी थी,  उसमें लगभग 50 लोग आए, जिस में छगन भाई जो कि कोई शर्त पूरी नहीं करते थे, फिर भी इसमें  शामिल हुए यह सोच कर कि कोशिश करने में कोई हर्ज़ा नहीं है ।बिलगेटस ने पूछा कि जो एमटेक और एमबीए नहीं है,वो यहां से चले जाएं।आधे लोग चले गए,पर छगन भाई नहीं उठे।  फिर कहा गया कि जिन्हें कम्प्यूटर की भाषाएं जैसे कि जावा आदि नहीं आती चले जाएं, पर छगन भाई बैठा रहता है कि कोशिश करने में क्या हर्ज है। फिर पूछा जाता है कि चीनी भाषा जिनको नहीं आती वो चले जाएं,छगन को गुजराती के अलावा कोई भाषा नहीं आती थी, पर फिर भी वो बैठा रहता है कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है।अंत में केवल दो ही प्रत्याशी बचते हैं तो उन्हें आपस में चीनी भाषा में वार्तालाप करने के लिए कहा जाता है, तो छगन भाई दूसरे से बोलता है केम छे अर्थात गुजराती में कैसे हो? तो दूसरा भी पूछता है केम छे कैसे हो? अर्थात गुजराती को टक्कर गुजराती ही दे सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि गुजरातियों में लगे रहने और धन कमाने की अदभुत क्षमता होती है। पर जो भी हो,ताजा प्रकरण धन  देकर लैब्स से मनचाही रिपोर्ट लेने वाली घटना इतनी  घिनौनी  लग रही  है कि धन दौलत के पीछे सब नैतिकता, मूल्यों की तिलांजलि और चरित्र का ह्रास नज़र आता है। इस अंधी दौड़ में शामिल लोग देश और समाज का कितना नुक्सान कर रहे हैं, इसकी थाह पाना मुश्किल है। सुना था भारत और भ्रष्टाचार की राशि एक है,अब तो लगने लगा है कि छल कपट और अनैतिकता राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बन कर रह गई है ,असूल और मूल्यों की परवाह नहीं करना हमारे डीएनए में शामिल हो चुका है और जुगाड़ तंत्र विकसित करना हमारे लहु में रच-बस गया है।  शायद मौत के समय भी यमराज को कुछ ले देकर बचने  का प्रयास करेंगे ।
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