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Dharam Karam

19वीं सदी के गृहस्थ-योगी योगेश्वर श्री रामलाल महाप्रभु जी

April 02, 2020 08:36 PM

में नीरसता का अनुभव कर रहा है । उसे सच्चे सुख एवं परम-शान्ति की चाह है । सब प्रकार की भौतिकवादी सुविधाएं भी, उसे आत्म-संतुष्टि प्रदान करने में विफल रही हैं। आज, सन 2020 में "कोरोना-वायरस" से सारी मानव जाति भयभीत है l पूरी दुनिया में गत 50 दिनों में 30000 से ज्यादा लोगों को "कोरोना" से हुई बीमारी के कारण, जीवन से हाथ धोना पड़ा है l अब, मानव यह महसूस करने लगा है कि, जीवन में सूकून उसे केवल परमपिता परमात्मा के चरणों में तथा सन्त- महात्माओं एवं गुरुओं द्वारा बताए मार्ग पर चल कर ही प्राप्त हो सकता है । सच्चे सुख की राह की ओर केवल सच्चा गुरु ही हमारा मार्गदर्शन कर सकता है। जब-जब भी पृथ्वी पर अशान्ति एवं अनाचार का वातावरण बना, तब-तब गुरुओं ने भटके हुए लोगों को सदमार्ग दिखाया। लोगों को अन्धकार से निकाल कर, उनके जीवन में नई ज्योति जगाई । गुरुओं ने आत्म-विश्लेषण का मार्ग बताया, ताकि मनुष्य स्वयं के अन्दर झांक सके l

भारत को देवभूमि कहा जाता है । इस धरती से उन अनगिनत गुरुओं एवं सन्तों का इतिहास जुड़ा है, जिन्होंने लोगों को जीने की एक नई राह दिखाई और योग-विद्या द्वारा, उन्हें आत्म विश्लेषण की ओर प्रेरित किया। चिरगुप्त योग-विद्या के पुनरुद्घारक योगेश्वर श्री रामलाल महाप्रभु ने भी इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु, सन् 1888 में चैत्र शुक्ल-नवमी के दिन पंजाब के अमृतसर नगर में अवतार लिया । उस समय लोग योग-विद्या को भूलकर दुर्बल, बिमार, चिन्तातुर, नीरस, हताश एवं वासनाओं से घिरे हुए मृत प्रायः अवस्था को प्राप्त हो रहे थे l उनकी ऐसी दुर्दशा देखकर, महा प्रभु, मानव तन में, श्री रामलाल के रूप में अवतरित हुए । आपके पिता पंडित गंडाराम एवं माता भागवन्ती बहुत ही धार्मिक प्रवृति के थे । आप बाल्यकाल से ही भगवान के चित्र, जहां कहीं टंगे देखते तो, उसी में ही टकटकी लगा लेते थे । ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये, आपके मन में साधु-महात्माओं के सत्संग और दिव्य अविनाशी स्वरूप में, विशेष स्थिति प्राप्त करने की, उत्कंठा बढ़ती चली गई । आपके मन में योग की ऊंची स्थिति प्राप्त करने की बड़ी अभिलाषा थी । इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु आप कुरुक्षेत्र, थानेसर में आ गये तथा पंडित बुलराज जी के पास विद्या अध्ययन करने लगे । तत्पश्चात्, आप हरिद्वार आ गये और ईश्वर की खोज में हिमालय की ओर प्रस्थान कर गये । विभिन्न प्रकार की कठिनाईयों को सहन करते हुए, आप दिन में प्रभु जी का चिन्तन करते और योगी-महात्माओं की खोज करते तथा रात्रि के समय भयंकर जंगली जीव-जन्तुओं से बचने के लिये, किसी ऊंचे वृक्ष की युगल शाखाओं पर शिला रख कर विश्राम करते थे l सच्चे गुरु की खोज में आप नेपाल से होते हुए, हिमालय की ओर घने जंगलों में चले गये । वहां एक अर्ध-रात्रि, जब आप ध्यान अवस्था में बैठे थे, तो आपको एक दिव्य अलौकिक महापुरूष ने आकर दर्शन दिये और कहा “उठो, ब्राह्यण देवता ! हम आप को लेने आये हैं। हमने ही आपको इधर आने की प्रेरणा दी थी । तत्पश्चात् आकाशमार्ग द्वारा वह आपको अपनी गुफा, जो हिमालय की ऊंची चोटी पर थी और जहां चारों ओर बर्फ ही बर्फ थी, ले गये। उन्होंने, वहां आपको कईं वर्षों तक समाधिस्थ रख कर, अष्टांग-योग की साधना में निपुण कर दिया । एक दिन सूर्योदय होने पर उन्होंने अपने श्रीमुख से आपको आशीर्वाद देते हुए कहा, “अब, आप जाकर संसारी आत्माओं का जहां-तहां उद्धार करें। आज्ञा पाकर महाप्रभु जी को प्रणाम कर व उनका दिव्य आर्शीवाद लेकर, आप आकाश-मार्ग द्वार, हिमालय से नेपाल की बस्तियों में आ गये और योग व जड़ी-बूटियों द्वारा बिमार / हताश लोगों के दुखों का निवारण करने लगे । बहुत से असाध्य-रोगी आपके आर्शीवाद से शीघ्र स्वस्थ होने लगे । आपने जीवन को स्वस्थ रखने एवं आत्मशुद्धि हेतु “योग-साधना” का एक सरल एवं सहज मार्ग लोगों को बताया lशीघ्र ही आपकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी । तत्पश्चात् आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर योग-विद्या का मूलमन्त्र लोगों को समझाने लगे। आप के दिव्य स्वरूप एवं अलौकिक तेज को देख कर, हजारों की संख्या में नर-नारी आपके ईश्वरमय वचनों को सुनने को आतुर हो उठते थे। आप के जीवन से कई चमत्कारिक घटनाएं जुड़ी हुई हैं। हजारों दुखी नर-नारियों का उद्धार कर, सन् 1938 में श्रावण पंचमी के दिन आपने मर्यादा रूप से भौतिक शरीर त्याग दिया तथा योग-विद्या के प्रचार एवं प्रसार का दायित्व अपने प्रिय शिष्य श्री मुलखराज जी को सौंपकर आकाशगमन कर गये ।योगेश्वर श्री मुलखराज जी भी दिन रात योग-विद्या द्वारा लोगों की मनोस्थिति को ऊंचा उठाते रहे और 25 वर्षों की साधना एवं तपस्या के बाद, योग-कार्य को आगे बढ़ाने का काम अपने प्रिय शिष्य स्वामी देवीदयाल जी महाराज को सौंपकर सन् 1962 में स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गये ।गुरु-परम्परा की उच्च मर्यादा को बनाये रखते हुए, योगीराज देवीदयाल जी महाराज निरन्तर 50 वर्षों तक, पूरे भारत में योग का प्रचार एवं प्रसार दिव्य-कार्य करते रहे और 1 अगस्त, 1998 को बह्मलीन हो गए । स्वामी देवीदयाल जी के मार्गदर्शन में भारत में 60 से ज्यादा "दिव्य योग मन्दिर" स्थापित हुए, जहां बिमार, हताश एवं निराश लोगों का, योग-साधना एवं यौगिक-क्रियाओं द्वारा काया-कल्प होता है । आज पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के अतिरिक्त दिल्ली, चंडीगढ़ व पंचकूला में स्थापित "दिव्य योग मन्दिरों" में हजारों नर-नारी, निशुल्क योग-आसन (जीवन-तत्व) करके, हंसी-खुशी जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं lलेखक, पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट, चंडीगढ़ में एडवोकेट हैं और सन् 1978 से योग में दीक्षित हैं ।

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