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राम लीला के वो दिन

October 08, 2018 03:18 PM

महानगरो, बड़े शहरों, छोटे शहरों, कस्बों में, रामायण की नाट्य कला प्रस्तुति, टी.वी. के सीरियल ‘‘ रामायण‘‘ आने पूर्व एक चिर अपेक्षित उत्सव की तरह होती थी । क्या बच्चे, क्या जवान, क्या बुढ़े, स्त्री-पुरूष सब लोग मिलकर इसका आनंद उठाते थे । शारदीय नवरात्रों के आगमन से पूर्व ही इसकी शुरूआत गुली-नुक्कड़ से लेकर बड़ी-बड़ी डृमाटिक कम्पनियां, रामलीला समितियां, रामलीलाओं के आयेजन, प्रबन्धन तथा प्रस्तुतिकरण में संलग्न हो जाती थी। विशेषकर प्रातः उत्तर भारत में राम-राम के आपस में संबोधन से लेकर अन्तिम विदाई‘‘ राम नाम सत्य है‘‘। ‘‘ राम‘ जन-जन के नायक बने तथा संस्कृति व संस्कारों के संवाहक ‘‘राम‘ बने, इसका श्रेय इन्हीं रामलीलाओं को जाता है । रामायण की कथा बार्चना तथा नित्यकर्म में रामायण की चौपाइयों का गान भी महत्वपूर्ण था परन्तु रामलीला का अलग ही मजा होता था। इसके द्वारा महत्वपूर्ण संस्कार जैसे मार्यादा, त्याग व सेवा सहज ही समाज में प्रचार-प्रसार व व्याप्त हो जाते थे । प्रतिदिन के नाटक में अलग ही संदेश होता था । सबसे बड़ी बात ये राम लीलाएं समाजिक, सांस्कृतिक व पारिवारिक मेलजोल को बढ़ाती थी तथा कई प्रकार की कलाओं जैसे गाना-बजाना, अभिनय, हास्य, साज सज्जा के विकास के लिए प्लेटफार्म उपलब्ध करवाती थी । स्थानीय स्तरों पर व्यक्तित्व के विकास, सहभागिता तथा समाजिक सरोकारों के प्रति सजगता पैदा करती थी । आज भी यदि किसी बूढ़े से पूछों कि राम नाम क्यूं लेना है, राम-राम क्यूं जपना है, तो वे आस्था का परिचय देते हुए कहेंगे कि ‘‘राम‘‘ नाम आराम देता है । राम तप-त्याग का प्रतीक है। उन्होंने स्वयं कष्ट सह कर सब को सुख देना चाहि । मार्यादा, स्व-अनुशासन, नैतिकता का पाठ जो पढ़ा शायद वहीं जीवन की द्युरी बन गया । उत्साह व उत्कण्ठा सामुहित होती थी शायद इसीलिए उस समय साधनों के सीमित होने पर भी निराशा व डिप्रेशन समाज में इस कदर नहीं फैली थी । आज तकनीक से सम्मोहित, टी.वी. तथा इंटरनेटों, फैसबुक,वाटसऐप के समय में, बच्चों को शायद वो यथार्थ के राम के चरित्र का नाटय मंचन ‘‘रामलीला‘‘ शब्द उतना उत्साहित न करता हो, पर हमारे समय में न केवल मनोरंजन अपितु ज्ञान रंजन का भी स्त्रोत था तथा आज भी उनकी अमिट छाप दिलो-दिमाग पर बनी हुई है । शाम के समय से ही अपनी बैठने की जगह घेरने के लिए बोरी व छोटी चारपाई उठाकर चले देते थे फिर मध्यरात्रि तक रामलीला का आनंद लते, उस दिन की प्रस्तुति पर टीका टिप्पणी कर घर को विदा लेते थे । छोटे दुकानदार जैसे कि रेहड़ी फड़ी वाले, खोमचे वालों को व्यवसाय करने का भी मौका मिलता था । इस 10 दिन से ज्यादा चलने वाले उत्सव में मेले का उत्साह तो होता ही था, ये रामलीलाएं सामाजिक व सांस्कृतिक जागरण तथा समरसता की संवाहक थी । मूल्यों तथा प्रतीकों की द्यरोहर सहज ही पुरानी पीढ़ी से नयी पीढ़ी को हस्तांतरण करने में इनका अपना योगदान है । लेकिन आज ये सब अतीत की बातें हो गयी है । जिंदगी से सुर व लय गायब है, इसीलिए भय चहूं और व्याप्त है । उत्साह और उमंग उधार लेकर जीते है । शायद इसीलिए वैयक्तिक स्तर पर तथा समुदाय के स्तर पर नैराश्य व उदासीनता का वातावरण है । अब समझ आया है परे श्रद्धा व सम्मान का दृष्टिकोण केवल रामलीला के लिए नहीं होता था, जीवन के लिए होता था । 

                    डा0 क0 कली

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