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Mahila Jagat

जीवन साथी तलाशने निकली भारतीय लडक़ी की चुनौतियों से रूबरू कराती हुक्ड, लाइन्ड एंड सिंगल।

December 07, 2014 10:36 AM

गिरीश सत्यपाल सैनी:भारतीय समाज में अगर आप महिला होने के बावजूद एक नियत उम्र के बाद भी अविवाहित हैं या किसी कारणवश पहली शादी असफल होने के बाद फिर से अकेली हैं और उसके बाद एक 'सही' आदमी की खोज में भी विफल हैं तो अपने आप ही आप को अव्यावहारिक, महत्वाकांक्षी, रुखी अथवा डिमांडिंग का दर्जा दे दिया जायेगा। 30 की आयु पार कर चुकी ऐसी ही युवती की कहानी बयां करती है रश्मि कुमार की नयी पुस्तक हुक्ड, लाइन्ड एंड सिंगल।

पत्रकारिता के क्षेत्र में एक उत्कृष्ट करियर छोड़ फिलहाल मातृत्व का आनंद ले रही रश्मि कुमार वर्तमान में कनाडा में सेटल्ड हैं। उनकी दूसरी पुस्तक हुक्ड, लाइन्ड एंड सिंगल के कथानाक से 30 से अधिक आयुवर्ग की वह सभी महिलाएं इत्तफ़ाक रखेंगी जो अविवाहित अथवा तलाकशुदा हैं और लगातार शादी करने के दबाव/इच्छा के बीच अपना जीवन जीते हुए बार बार खुद से सवाल करती हैं कि आखिर मैं कहाँ गलत थी?

पुस्तक की मुख्य किरदार अलाफिया सिंह है, जो पारंपरिक तरीकों से अपने लिए जीवन साथी ढूंढने निकली है। मैट्रीमोनियल साइट्स, अख़बारों के क्लासिफाइड के अलावा दोस्तों द्वारा बताये गए संपर्कों के माध्यम से अलाफिया अपने लिए दूल्हा ढूंढती है। इस सारे घटनाक्रम के बीच जहाँ कई गुदगुदाने वाले क्षण भी आते हैं, वहीँ मुख्य रूप से ऐसी लड़कियों का दर्द दर्शाया गया है जिन्हें विवाह न होने के कारण परिवार के साथ साथ रिश्तेदारों के व्यंग्य और आलोचना झेलनी पडती है। हालाँकि इस कथानाक में अलाफिया किसी के दबाव की बजाय अपनी इच्छा से शादी करने को बेताब है, लेकिन उसके बावजूद उसे विभिन्न स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते अलाफिया के किरदार से सहानुभूति पैदा होना स्वाभाविक है। पहले पति से अलगाव का दंश झेलने के क्षण भी कथा का अहम हिस्सा है। वहीँ इस कथा में हमारे समाज की उस मानसिकता को भी दर्शाया गया है जहाँ आपसे छोटे भाई बहिन की शादी आपसे पहले होने पर आपको गलत समझा जाता है। क्या खुश रहने के लिए शादी जरुरी है? क्या अकेली, आत्म निर्भर लडक़ी खुश नहीं रह सकती? क्या सिर्फ परिजनों, नाते रिश्तेदारों की ख़ुशी के लिए विवाह करना जायज है? ऐसे ही कुछ अहम सवाल भी इस पुस्तक में उठाये गए हैं। इसके अलावा उत्तराखंड के लंढोर तथा जिम कॉर्बेट पार्क के प्रसंग लेखिका के घुम्मकड स्वभाव तथा प्रकृति से लगाव के परिचायक है।

मानसिक रूप से व्यथित और आत्मघाती प्रवत्ती वालों की सहायता के लिए काम करने वाले एक एनजीओ की सक्रिय कार्यकर्ता रही रश्मि इससे पूर्व अपना पहला नॉवेल स्टीलेटॉस इन द न्यूज़ रूम लिख चुकी हैं, जिसमें एक महिला पत्रकार के न्यूज़ रूम के अनुभवों को प्रस्तुत किया गया है। रश्मि को 2013 में कनाडा वासियों के समक्ष भारतीय साहित्यिक कार्य प्रदर्शित करने के लिए राइटर-इन-एक्सिल चुना गया था।

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