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एचपीएससी भर्ती विवाद: हाई कोर्ट के फैसले ने खोली चयन प्रक्रिया की पोल

May 13, 2026 01:46 PM
हरियाणा में असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का हालिया फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि लाखों बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों को नई दिशा देने वाला निर्णय बनकर सामने आया है। लंबे समय से भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, इंटरव्यू अंकों, चयन प्रणाली और बड़ी संख्या में खाली छोड़े गए पदों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच हाई कोर्ट द्वारा एचपीएससी की चयन प्रक्रिया और विज्ञापन को रद्द किया जाना यह संकेत देता है कि अब भर्ती प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है।
हरियाणा लोक सेवा आयोग यानी एचपीएससी ने 2424 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों के लिए 26 विषयों में विज्ञापन जारी किया था। यह भर्ती लंबे समय से बेरोजगारी का सामना कर रहे हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण मानी जा रही थी। लेकिन जैसे-जैसे चयन प्रक्रिया आगे बढ़ी, वैसे-वैसे विवाद भी बढ़ते चले गए। युवाओं का आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और बड़ी संख्या में पद जानबूझकर खाली छोड़ दिए गए।
सबसे हैरानी की बात यह है कि कुल 2424 पदों में से अब तक केवल लगभग 25 प्रतिशत पदों को ही भरा गया है, जबकि बाकी अधिकांश पद खाली छोड़ दिए गए। जिन पदों पर चयन हुआ भी है, उनमें बड़ी संख्या दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों की बताई जा रही है। इससे हरियाणा के युवाओं में गहरा असंतोष पैदा हो गया है। युवाओं का कहना है कि जब राज्य में हजारों योग्य नेट, पीएचडी और अनुभवी अभ्यर्थी मौजूद हैं, तब बड़ी संख्या में पद खाली छोड़ना और बाहर के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना कई सवाल खड़े करता है।
असिस्टेंट प्रोफेसर अंग्रेजी विषय की भर्ती को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यूजीसी-2018 रेगुलेशन की अनदेखी करके भर्ती नहीं की जा सकती। अदालत ने माना कि हरियाणा सरकार और एचपीएससी द्वारा अपनाई गई चयन प्रक्रिया यूजीसी के नियमों के अनुरूप नहीं थी। कोर्ट ने विज्ञापन संख्या 48/2024 और उससे जुड़ी चयन प्रक्रिया को रद्द करते हुए भर्ती प्रक्रिया को दोबारा यूजीसी नियमों के अनुसार शुरू करने के निर्देश दिए।
अंग्रेजी विषय में कुल 613 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया चल रही थी। इनमें से मेन्स टेस्ट यानी एसकेटी में केवल 151 उम्मीदवारों को ही पास घोषित किया गया। बाद में इनमें से भी कुछ उम्मीदवारों को बाहर कर दिया गया और लगभग 468 पद खाली छोड़ दिए गए। इसी प्रकार अन्य कई विषयों में भी भारी संख्या में पद रिक्त रखे गए हैं। इससे यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर आयोग भर्ती करना चाहता है या केवल औपचारिकताएं पूरी कर रहा है।
यदि विभिन्न विषयों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो स्थिति और अधिक चौंकाने वाली दिखाई देती है। असिस्टेंट प्रोफेसर मैथ के 163 पदों में से केवल 17 उम्मीदवारों को पास किया गया जबकि लगभग 140 पद खाली छोड़ दिए गए। डिफेंस स्टडी के 23 पदों में से केवल 5 उम्मीदवार सफल घोषित किए गए और 18 पद रिक्त रह गए। इकोनॉमिक्स विषय के 43 पदों में से केवल 24 उम्मीदवारों को चयनित किया गया और 19 पद खाली छोड़ दिए गए। फिजिकल एजुकेशन के 126 पदों में से 89 पद भरे गए जबकि 37 पद रिक्त रहे। सबसे अधिक चर्चा फिजिक्स विषय को लेकर रही, जहां 410 पदों में से केवल लगभग 100 उम्मीदवारों को पास किया गया और 300 से अधिक पद खाली छोड़ दिए गए।
स्थिति केवल असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती तक सीमित नहीं है। एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर यानी एडीओ भर्ती में 605 पदों में से केवल 50 उम्मीदवारों को चयनित किया गया जबकि 555 पद खाली छोड़ दिए गए। इसी प्रकार पीजीटी कंप्यूटर साइंस के 1711 पदों में से केवल 39 उम्मीदवारों को पास किया गया और 1672 पद रिक्त रखे गए। ऐसे आंकड़े युवाओं के मन में आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर संदेह पैदा कर रहे हैं।
युवाओं का कहना है कि यदि प्रदेश में योग्य उम्मीदवार मौजूद नहीं होते तो पद खाली छोड़ना समझा जा सकता था, लेकिन जब हजारों नेट, पीएचडी, जेआरएफ और अनुभवी अभ्यर्थी वर्षों से भर्ती का इंतजार कर रहे हों, तब इतने बड़े स्तर पर पद रिक्त रखना समझ से परे है। इससे न केवल बेरोजगार युवाओं में निराशा बढ़ रही है बल्कि सरकारी कॉलेजों और स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी भी बनी हुई है, जिसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
हिंदी विषय की भर्ती को लेकर भी कई गंभीर आरोप सामने आए हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि इंटरव्यू प्रक्रिया में हरियाणा के युवाओं को अपेक्षाकृत कम अंक दिए गए, जबकि दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों को अधिक अंक देकर चयन सूची में ऊपर रखा गया। अखबारों में प्रकाशित सूचनाओं के अनुसार चयनित उम्मीदवारों में बड़ी संख्या बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और दिल्ली जैसे राज्यों से संबंधित बताई जा रही है। इससे स्थानीय युवाओं में यह भावना पैदा हो रही है कि उनके साथ अन्याय किया जा रहा है।
इंटरव्यू अंकों को लेकर भी आयोग सवालों के घेरे में है। कई उम्मीदवारों को इंटरव्यू में केवल 4 से 9 अंक तक दिए गए, जबकि उनके पास नेट, पीएचडी, शिक्षण अनुभव और मजबूत अकादमिक रिकॉर्ड मौजूद थे। युवाओं का आरोप है कि इंटरव्यू प्रणाली का इस्तेमाल योग्य उम्मीदवारों को बाहर करने और मनमाने तरीके से चयन करने के लिए किया गया। विशेष रूप से आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का आरोप है कि उनके साथ और अधिक अन्याय हुआ तथा बड़ी संख्या में आरक्षित पद भी खाली छोड़ दिए गए।
मनोविज्ञान यानी साइकोलॉजी विषय की भर्ती परीक्षा ने भी आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए। 85 पदों के लिए आयोजित परीक्षा में 335 उम्मीदवारों ने भाग लिया, लेकिन उनमें से केवल 3 उम्मीदवार ही न्यूनतम अंक हासिल कर सके। यह परिणाम सामने आने के बाद पूरे प्रदेश में चर्चा शुरू हो गई कि क्या परीक्षा का स्तर असामान्य रूप से कठिन रखा गया था या फिर भर्ती प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर खामियां मौजूद हैं।
असिस्टेंट प्रोफेसर अंग्रेजी विषय के अभ्यर्थी पिछले लगभग चार महीनों से लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलनरत युवा अब गांव-गांव जाकर राज्यव्यापी अभियान चला रहे हैं और भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लोगों के सामने रख रहे हैं। युवाओं को अब हाई कोर्ट के फैसले से नई उम्मीद मिली है। अदालत के निर्णय के बाद आंदोलनरत अभ्यर्थियों में उत्साह का माहौल देखा जा रहा है।
आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों की मुख्य मांग है कि 35 प्रतिशत का पात्रता मानदंड समाप्त किया जाए तथा साक्षात्कार के लिए कम से कम पदों के मुकाबले दो से तीन गुना अभ्यर्थियों को बुलाया जाए, ताकि अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक चयन प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके। युवाओं का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में बहुत कम उम्मीदवारों को इंटरव्यू तक पहुंचने का मौका मिलता है, जिससे चयन प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ जाती है।
विपक्षी नेता भी अब खुलकर युवाओं के समर्थन में सामने आने लगे हैं। कई विपक्षी दलों के नेताओं ने आंदोलनरत अभ्यर्थियों से मुलाकात कर भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि एचपीएससी की कार्यप्रणाली लगातार विवादों में घिरती जा रही है और सरकार इस पूरे मामले पर गंभीरता नहीं दिखा रही।
दरअसल यह केवल एचपीएससी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि हरियाणा सरकार की विश्वसनीयता का भी प्रश्न बन चुका है। यदि भर्ती प्रक्रियाओं पर लगातार सवाल उठते रहे, अदालतें चयन प्रक्रियाओं को रद्द करती रहीं और योग्य युवा सड़कों पर आंदोलन करते रहे, तो इससे सरकार की छवि पर भी सीधा असर पड़ना स्वाभाविक है।
हरियाणा सरकार को अब इस पूरे मामले का गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इंटरव्यू प्रक्रिया की रिकॉर्डिंग, यूजीसी नियमों का सख्ती से पालन, मेरिट आधारित चयन और खाली पदों को भरने के लिए स्पष्ट नीति बनाना जरूरी हो गया है।
आज प्रदेश का युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि न्याय चाहता है। वह यह जानना चाहता है कि वर्षों की मेहनत, आर्थिक संघर्ष और मानसिक दबाव के बाद भी यदि भर्ती प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं होगी, तो फिर उसकी मेहनत का मूल्य क्या रह जाएगा। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का फैसला युवाओं के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आया है। अब देखना यह होगा कि सरकार और एचपीएससी इस फैसले से क्या सीख लेते हैं और भविष्य में भर्ती प्रक्रियाओं को कितना पारदर्शी और निष्पक्ष बना पाते हैं।
 
सतीश मेहरा
 
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