हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी ने शुक्रवार को हरियाणा विधानसभा के बजट सत्र के दौरान राज्यपाल के अभिभाषण पर विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए कांग्रेस को जमकर घेरा। उन्होंने बताया कि राज्यपाल द्वारा 20 फरवरी को दिया गया अभिभाषण राज्य की दशा व दिशा को व्यक्त करने वाला है। यह अभिभाषण हरियाणा के भविष्य की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। एक ऐसे हरियाणा की, जो विकास, सुशासन, सामाजिक न्याय और समावेशी प्रगति के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह अभिभाषण ‘विकसित हरियाणा’ के स्पष्ट रोडमैप को दिखाता है, और वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को भी दिखाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि यहां असहमति को भी सम्मान मिलता है, लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह भी आवश्यक है कि सरकार के जनकल्याण व विकास कार्यों की सराहना भी की जानी चाहिए।
उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि विपक्ष ने सरकार की आलोचना करने के लिए केवल रटी-रटाई बातें बोली हैं, कोई तथ्यात्मक बात नहीं रखी। सरकार के कल्याणकारी कार्यों से प्रदेश की जनता प्रभावित हुई और हमें लगातार तीसरी बार जनसेवा का मौका दिया।
वंदे मातरम् पर बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह बड़े गर्व की बात है कि इस बार के बजट अधिवेशन की शुरुआत वंदे मातरम् गीत से हुई। विपक्षी सदस्यों द्वारा वंदे मातरम् गीत पर की गई टीका-टिप्पणी पर मुखर होते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम् हमारे राष्ट्र की आत्मा है, हमारी सांस्कृतिक चेतना है और हमारी स्वतंत्रता की तपस्वी यात्रा का स्मरण है। यह हमारे संघर्ष और स्वाभिमान की 150 वर्ष की लंबी गाथा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज हम ऐसे कालखंड में खड़े हैं, जब राष्ट्र अपने इतिहास के कई गौरवशाली अध्यायों को एक साथ स्मरण कर रहा है। हाल ही में, संविधान के 75 गौरवपूर्ण वर्ष पूरे हुए हैं। देश सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती मना रहा है, भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती मना रहा है और श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी वर्ष को श्रद्धापूर्वक नमन कर चुका है। इन सभी स्मृतियों के बीच वंदे मातरम् के 150 वर्ष हमें यह याद दिलाते हैं कि भारत की आत्मा केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान से भी बनी है।
उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् गीत 7 नवंबर, 1875 को सार्वजनिक हुआ। इसके बाद वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति, त्याग और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया, जिसने हमारे आजादी के आंदोलन का रास्ता प्रशस्त किया। वर्ष 1907 में कलकत्ता में वंदे मातरम् नाम का अंग्रेज़ी अखबार शुरू हुआ, जिसके संपादक महर्षि अरविंद थे। उस समय ब्रिटिश सरकार ने उसे सबसे खतरनाक राष्ट्रवादी पत्र माना और श्री अरविंद पर राजद्रोह का मुकदमा चलाते हुए उन्हें सज़ा दी। वर्ष 1896 में गुरुदेव टैगोर ने पहली बार कांग्रेस के अधिवेशन में वंदे मातरम् को सार्वजनिक रूप से गाया।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1905 में वाराणसी अधिवेशन में महान कवयित्री सरला देवी चौधरानी ने पूर्ण वंदे मातरम् का गान किया। गुलामी के कालखंड के दौरान जब वर्ष 1936 के बर्लिन ओलंपिक में हमारी हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता, तब भी भावपूर्ण तरीके से वंदे मातरम् का गान किया गया। 15 अगस्त, 1947 को जब देश आजाद हुआ, तब सुबह साढ़े 6 बजे सरदार पटेल के आग्रह पर पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने आकाशवाणी से अपने मधुर स्वर में वंदे मातरम् का गान कर देश को भावुक कर दिया।
मुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के बराबर सम्मान देते हुए राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् की यात्रा जितनी गौरवपूर्ण है, उतनी ही संघर्षपूर्ण भी रही है। जब वंदे मातरम् के 50 वर्ष पूरे हुए, तब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। जब इसके 100 वर्ष पूरे हुए, तब देश आपातकाल की जंजीरों में बंधा हुआ था और लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था। यह इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण संयोग है कि जिस मंत्र ने देश को स्वतंत्रता की ऊर्जा दी, उसी के 100 वर्ष पूरे होने पर देश ने लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन का एक काला अध्याय देखा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज, जब वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, यह अवसर उस गौरव को पुनः स्थापित करने का है। उस चेतना को फिर से जागृत करने का है और यह संकल्प दोहराने का है कि भारत कभी भी अपने मूल्यों से समझौता नहीं करेगा। यदि वंदे मातरम् की भावना न होती, तो आज हम जनप्रतिनिधि के रूप में इस सदन में न बैठे होते।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सदन में वंदे मातरम् की उस भावना को स्मरण करना अत्यंत आवश्यक है, जिसे स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने शब्द दिए थे। दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘इंडियन ओपिनियन’ में 2 दिसंबर, 1905 को गांधी जी ने लिखा था कि ‘बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् पूरे बंगाल में स्वदेशी आंदोलन की आत्मा बन चुका है।’ लाखों लोग एक स्वर में सभाओं में इस गीत को गा रहे हैं, इससे लग रहा है कि वंदे मातरम् हमारा राष्ट्रीय गान बन गया हो।
मुख्यमंत्री ने सदन में मुस्लिम लीग और कांग्रेस द्वारा उस दौर में वंदे मातरम् को लेकर की गई टीका-टिप्पणियों पर भी अपने विचार रखे। मुख्यमंत्री ने कहा कि बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इतना महान और पवित्र गीत होते हुए भी, दुर्भाग्यवश, पिछली सदी में इसके साथ अन्याय हुआ। तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में वंदे मातरम् को विवादों में घसीटा गया। इसके भाव को तोड़ने का प्रयास किया गया। यह इतिहास का एक कटु सत्य है, जिसे नई पीढ़ी को जानना बहुत जरूरी है, ताकि भविष्य में राष्ट्र की आत्मा के साथ ऐसा अन्याय फिर कभी न हो।