प्राकृतिक खेती की अवधारणा को प्रदेश के किसानों और खेत - खलिहानों तक पहुँचाने के लिए आज सोनीपत के खरखौदा स्थित भरत वाटिका में 'प्राकृतिक खेती समृद्ध किसान सम्मेलन' का आयोजन किया गया। प्राकृतिक खेती पर आधारित इस किसान सम्मेलन में गुजरात एवं महाराष्टï्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की और किसानों को प्राकृतिक खेती करने के लिए प्रेरित किया।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक खेती पूरी तरह प्रकृति के नियमों पर आधारित, कम खर्चीली और दीर्घकालिक रूप से लाभकारी है। इसका मूल आधार देसी गाय है। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के साथ बताया कि देसी गाय के गोबर और गोमूत्र में करोड़ों की संख्या में लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु होते हैं, जो मिट्टी को पुनः: जीवंत कर देते हैं।
राज्यपाल ने प्राकृतिक खेती में सबसे उपयोगी जीवामृत की विधि समझाते हुए बताया कि देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल के बेसन और खेत की मिट्टी से तैयार जीवामृत खेत में डालने से सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है। ये सूक्ष्म जीवाणु पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व तैयार करते हैं, केंचुओं की संख्या बढ़ाते हैं और मिट्टी की जलधारण क्षमता में सुधार करते हैं। इससे भूमि दोबारा उपजाऊ बनती है, पैदावार बढ़ती है और खेती टिकाऊ बनती है।
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से खेतों में केंचुए, मित्र कीट और सूक्ष्म जीवाणु वापस आते हैं, जिससे मिट्टी नरम होती है, वर्षा का जल धरती में समाता है और भूजल स्तर को भी संरक्षण मिलता है। यह पद्धति न केवल किसान की आय बढ़ाती है, बल्कि पर्यावरण और जल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने जानकारी दी कि केंद्र सरकार ने प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाया है और हरियाणा सरकार द्वारा भी प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से किसानों को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
रासायनिक खेती के दुष्परिणामों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह और किडनी जैसी गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका सीधा संबंध जहरीले रसायनों से उगाए गए भोजन से है।
किसान सम्मेलन में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मोहनलाल बड़ौली ने कहा कि प्राकृतिक खेती पद्धति न केवल किसान की आय बढ़ाएगी, बल्कि देश को आत्मनिर्भर बनाने में भी अहम भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि किसान समर्थ होगा तो देश भी समर्थ होगा, क्योंकि भारत की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ खेती है।