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15 जुलाई- विश्व युवा कौशल दिवस पर विशेष

July 14, 2026 01:07 PM
आज की दुनिया में केवल डिग्री सफलता की गारंटी नहीं रही। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और तेजी से बदलती तकनीकों ने रोजगार की पूरी तस्वीर बदल दी है। किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए अब कौशल पहली और अनिवार्य शर्त है। अब उद्योग ऐसे युवाओं की तलाश में हैं, जिनके पास कौशल है और जो पहले दिन से काम करने के लिए तैयार हों। संयुक्त राष्ट्र ने 15 जुलाई को 'विश्व युवा कौशल दिवस' मनाने की शुरुआत की, ताकि युवाओं को कौशल के माध्यम से रोजगार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया जा सके।
 
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति भारत की सबसे बड़ी पूंजी है, लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा जब युवाओं के पास डिग्री के साथ उद्योगों की जरूरत के अनुरूप कौशल भी होगा। नई शिक्षा नीति-2020 भी अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि रोजगारोन्मुखी, व्यावहारिक और कौशल आधारित शिक्षा पर जोर देती है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 'फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट-2025' के अनुसार वर्ष 2030 तक दुनिया में लगभग 7.8 करोड़ रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे। लेकिन इन अवसरों का लाभ वही युवा उठा पाएंगे, जिनके पास भविष्य की मांग के अनुरूप कौशल होगा। अगले पांच वर्षों में एक तिहाई से भी ज्यादा कौशल आवश्यकताओं में बदलाव आएगा। इसलिए अब सीखना एक बार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली आवश्यकता बन चुका है। इसीलिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं को सफलता का मन्त्र भी दिया है  ''कौशल, नवीन कौशल और अतिरिक्त कौशल'। यह हमें कौशल की सतत प्रक्रिया की ओर प्रेरित करता है।     
 
भारत में भी आने वाले वर्षों में रोजगार का बड़ा विस्तार तकनीक आधारित क्षेत्रों में होने जा रहा है। विभिन्न उद्योग रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2030 तक लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे, इलेक्ट्रिक वाहन एवं बैटरी तकनीक में लगभग 20 लाख, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस में 12 लाख से अधिक तथा सेमीकंडक्टर उद्योग में 10 लाख से अधिक रोजगार अवसर विकसित होने का अनुमान है। इसके अलावा साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा एनालिटिक्स, रोबोटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, ग्रीन एनर्जी, ड्रोन टेक्नोलॉजी, 3-डी प्रिंटिंग, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर, फार्मा, हॉस्पिटैलिटी, प्रिंटिंग एवं पैकेजिंग, एयर कंडीशनिंग एवं रेफ्रिजरेशन, मशीन टूल्स, मेक्ट्रॉनिक्स, सप्लाई चेन और वेयरहाउसिंग जैसे क्षेत्रों में कुशल मानव संसाधन की मांग लगातार बढ़ रही है।
 
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चिंता की बात यह है कि कई भारत में आज भी प्रशिक्षित और इंडस्ट्री-रेडी युवाओं की कमी बनी हुई है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार देश में आधे स्नातक ही प्रत्यक्ष रूप से रोजगार योग्य माने जाते हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि केवल पारंपरिक शिक्षा अब पर्याप्त नहीं है। तकनीकी कौशल के साथ-साथ संचार क्षमता, समस्या समाधान, नेतृत्व, टीमवर्क, रचनात्मक सोच और डिजिटल साक्षरता जैसी सॉफ्ट स्किल्स भी सफलता की अनिवार्य शर्त बन चुकी हैं।
 
भारत सरकार ने भी कौशल विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया है। स्किल इंडिया मिशन, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और सेमीकॉन इंडिया मिशन जैसे कार्यक्रम भारत को वैश्विक स्किल कैपिटल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लक्ष्य केवल विनिर्माण क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत को दुनिया का सबसे बड़ा कुशल मानव संसाधन प्रदाता बनाना है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भारत को दुनिया की स्किल कैपिटल बनाने का संकल्प लिया है। इसमें हम सब को सहभागी बनना होगा।   
 
विदेशों में भी भारतीय युवाओं के लिए अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं। जर्मनी में एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल, मेक्ट्रॉनिक्स, मशीन ऑपरेशन और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की भारी मांग है। जापान वृद्ध होती आबादी के कारण केयरगिवर्स, नर्सिंग, रोबोटिक्स और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं की तलाश कर रहा है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में निर्माण, इलेक्ट्रिकल, प्लंबिंग, आईटी, हेल्थकेयर और ट्रेड स्किल्स वाले युवाओं के लिए उत्कृष्ट अवसर हैं। वहीं यूएई, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, होटल प्रबंधन, एविएशन और तकनीकी क्षेत्रों में कुशल मानव संसाधन की निरंतर आवश्यकता बनी हुई है। यूरोप में ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहन, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में तकनीकी कौशल के साथ विदेशी भाषाओं का ज्ञान भी रोजगार की नई संभावनाएं खोलेगा। जर्मन, फ्रेंच, जापानी और कोरियाई जैसी भाषाएं सीखने वाले युवाओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक उद्योगों में बेहतर अवसर मिल सकते हैं। इसी के दृष्टिगत श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय ने प्रत्येक विद्यार्थी के लिए एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य किया हुआ है। साथ ही कौशल को वरीयता देते हुए विश्वविद्यालय ने शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी को कम करने के लिए 40 प्रतिशत अध्ययन विश्वविद्यालय परिसर में तथा 60 प्रतिशत प्रशिक्षण उद्योगों में कराने की दोहरी शिक्षा प्रणाली विकसित की है। विश्वविद्यालय ने अब तक 125 से अधिक उद्योगों और कॉर्पोरेट संस्थानों के साथ साझेदारी की है, जहां विद्यार्थी ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग प्राप्त करते हैं। उद्योग केवल प्रशिक्षण ही नहीं देते, बल्कि पाठ्यक्रम निर्माण, मूल्यांकन और प्लेसमेंट प्रक्रिया में भी भागीदार हैं। इसका परिणाम है कि विश्वविद्यालय का प्लेसमेंट रिकॉर्ड लगभग 82 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
 
विश्वविद्यालय का "अर्न व्हाइल लर्न" मॉडल भी युवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहा है। प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को 7 हजार से 35 हजार रुपये प्रतिमाह तक स्टाइपेंड मिलता है। इससे शिक्षा का आर्थिक बोझ कम होता है और विद्यार्थी पढ़ाई के साथ वास्तविक कार्य अनुभव भी अर्जित करते हैं। कई विद्यार्थी डिग्री पूरी होने से पहले ही उद्योगों की पहली पसंद बन जाते हैं।
 
आज आवश्यकता केवल नौकरी खोजने वालों की नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाले युवाओं की है। स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, डिजिटल प्लेटफॉर्म और रिमोट वर्क ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा अब भौगोलिक सीमाओं की मोहताज नहीं रही। सही कौशल रखने वाला युवा दुनिया के किसी भी कोने में अपनी पहचान बना सकता है। विश्व युवा कौशल दिवस का संदेश स्पष्ट है, भविष्य डिग्री का नहीं, दक्षता का है; प्रमाणपत्र का नहीं, क्षमता का है।
 
प्रोफेसर दिनेश कुमार 
कुलगुरु, श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय 
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