शहर के सेक्टर स्थित ब्रह्माकुमारीज के सद्भावना भवन में होली का पावन पर्व अत्यंत उत्साह, गरिमा और आध्यात्मिक वातावरण में मनाया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहरवासी, संस्था के सदस्य एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। भजनों, आध्यात्मिक गीतों और प्रेरक संदेशों से सुसज्जित इस आयोजन ने होली को केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन का पर्व बना दिया।रंगों के साथ प्रेम, एकता और सद्भाव का संदेशकार्यक्रम के दौरान उपस्थित जनसमूह ने एक-दूसरे को रंगों के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं दीं। वातावरण भक्तिमय संगीत और आत्मीय संवाद से सराबोर रहा। श्रद्धालुओं ने प्रेम, भाईचारे और आपसी सौहार्द का संदेश साझा करते हुए होली के आंतरिक और आध्यात्मिक स्वरूप को आत्मसात किया।“हो-ली” — जो हो गया, उसे जाने देंइस अवसर पर राजयोगिनी अनीता दीदी ने पंचकूलावासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि होली का वास्तविक अर्थ समझना आवश्यक है। “हो-ली” का भाव है — जो हो गया, सो हो गया। उन्होंने कहा कि अतीत को पकड़कर रखने से वर्तमान की ऊर्जा क्षीण होती है। भूतकाल चाहे कितना भी स्वर्णिम क्यों न रहा हो, उसे पुनः नहीं लाया जा सकता।उन्होंने कहा, “जीवन और मृत्यु दोनों वर्तमान में घटित हो रहे हैं, इसलिए वर्तमान को सार्थक और सकारात्मक बनाना ही सच्ची होली है।”अभिमान और ग्लानि — दोनों ही बंधनउन्होंने अपने संदेश में कहा कि यदि हम बीते समय की उपलब्धियों को बार-बार स्मरण करते हैं तो मन में अभिमान उत्पन्न होता है, और यदि पुराने दुःखों को याद करते हैं तो ग्लानि, व्याकुलता और प्रतिशोध के भाव जन्म लेते हैं। समय को कोई नहीं रोक सका, परन्तु मन अतीत की स्मृतियों में उलझकर स्वयं को बंधन में जकड़ लेता है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि वे अपने मन को मुक्त कर सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें।आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है होली का पर्वअपने उद्बोधन के समापन में उन्होंने कहा कि बीती बातों को भुलाकर समय के साथ निरंतर आगे बढ़ना ही सच्ची होली है। यह पर्व हमें आत्मशुद्धि, नवचेतना और जीवन में प्रगति की प्रेरणा देता है।कार्यक्रम का समापन शांति पाठ एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ। उपस्थित लोगों ने आध्यात्मिक वातावरण में मनाई गई इस होली को अत्यंत प्रेरणादायी और स्मरणीय बताया।