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समृद्धि व जनआस्था का प्रतीक हैं सतनाली का भैरों बाबा का मन्दिर

April 09, 2014 03:21 PM

एल.सी वालिया, सतनाली: सतनाली कस्बे के बीचोंबीच स्थित बाबा भैरव मन्दिर सतनाली व आसपास के क्षेत्र सहित सीमावर्ती राजस्थान रा'य के लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है। प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की शुक्ल एकादशी को मन्दिर में बाबा भैंरों का प्रसिद्व मेला लगता है। मान्यता है कि बाबा भैरव मेलें के दिन कस्बे के लोग जो दूरदराज व बाहरी क्षेत्रों में जाकर बसे हुए है वे भी बाबा भैरव मन्दिर में पूजा अर्चना के लिए सतनाली अवश्य पंहुचते है। सीमावर्ती राजस्थान रा'य के लोगों की आस्था का केन्द्र होने के कारण मेलें की प्रसिद्वि दूर-दूर तक फैली है। कस्बे की पूर्व दिशा में बने बाबा भैंरों के मन्दिर में श्रद्धालु तेल, अन्न व शराब अर्पित कर बाबा भैरों से समृद्धि व सुख की कामना करते हैं। घरों में तेल से बने पकवान गुलगुले आदि बनाऐ जाते हैं। यह अछुता पकवान बाबा भैरों के मन्दिर में प्रसाद के रूप में चढ़ाकर लोग इनका आनन्द लेते हैं। गांव के हर घर में भैरों की मान्यता हैं। ऐसा माना जाता हैं कि बाबा भैंरों सुरक्षा व समृद्वि प्रदान करते हैं।

बाबा भैरव मन्दिर के इतिहास के सन्दर्भ में गांव के बुजूर्ग बताते हैं कि इस मेले का इतिहास अधिक पुराना नही है। सम्वंत 2004 में सतनाली गांव में भीषण आग लग गई व अधिकांश घर आग की चपेट में आ गए व भारी नुकसान हुआ। इसके पश्चात लगभग प्रतिवर्ष गांव में आग लगने व इसके नुकसान होने की घटनाऐं होने का सिलसिला आरम्भ हो गया। सम्वंत 2007 में पुन: भीषण आग ने सम्पूर्ण गांव को अपनी चपेट में ले लिया जिससे गांव में भारी क्षति हुई। ग्रामीण इन अग्निकांडों से चिन्तित हो गए व उपाय खोजने लगे। सम्वंत 2008 में कुम्हार समुदाय द्वारा गांव में पूर्व दिशा में मिट्टी के टिब्बें से खुदाई कार्य के दौरान एक धातु की बाबा भैरों की प्रतिमा प्राप्त हुई। इस प्रतिमा को तत्कालीन सरपंच जगमाल सिंह वालिया ने वहीं पर स्थापित कर दिया गया व बाबा भैरों का रात्रि जागरण कर बाबा से गांव को आग से बचाने के लिये कामना की। बताया जाता है कि इसके बाद से गांव में आग नही लगी। इसके बाद कस्बे के एक वालिया परिवार ने अपने कजावे की ईंटे दान में दी, जो बाबा भैरों के मन्दिर के निर्माण में लगाई गई। मन्दिर के पुजारी के रूप में लाधु कुम्हार को मन्दिर में बैठाया गया तथा इसीबीच गांव में एक मकान की नींव खुदाई में माता की मूर्ति भी मिली, जिसे बाद में भैरव मन्दिर में स्थापित कर दिया गया। मन्दिर निर्माण में कस्बे के वालिया समुदाय व कुम्हार समुदाय का अह्म योगदान रहा। इसके साथ ही गांव में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल की दशवीं को विशाल जागरण का आयोजन किया जाता है व एकादशी को प्रतिवर्ष मेला लगता है। उस समय लगे मेलें में जितनी भीड़ उमड़ी उसके समक्ष गांव की हर गली व मैदान भी टोटा पड़ गया। इसके बाद से ही मेला तो हरवर्ष आयोजित किया जाता है, लेकिन उस मेलें की याद आज भी बुजूर्गो के जेहन में समाई हुई है। युवतियों के लिये इस मेले का विशेष आकर्षण होता है। इसमें कई तरह के झूले लगते है जो मेले की शान बढ़ाते है। मेला स्थल व भैरों मन्दिर के साथ यात्रियों की सुविधा के लिये पेयजल हेतु पानी की टंकी स्थापित की गई है। मेले के बेहतर प्रबन्ध व श्रृद्धालुओं की सुविधा के लिए युवकों द्वारा भैरों दल सेवा समिति नामक संस्था का गठन भी किया गया है। यह दल व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय है। लेकिन विगत कुछ वर्षों से इस मेले का महत्व कम हो रहा है। मेले का खुला स्थल भी अब मकान निर्मित होने के कारण संकुचित पडऩे लगा है। मेलास्थल पर फैली गन्दगी व गन्दे नालों के कारण यहां की सुन्दरता प्रभावित हुई है। मेले में चोर उचक्कों व आवारा किस्म की सक्रियता के कारण भी मेले की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है। इन सबके बावजूद मेलें का महत्व व बाबा भैरों में लोगों की आस्था आज भी बरकरार है।

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