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मीडिया को अपनी आजादी और सत्य जानने और लोगों तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी स्वयं अक्षुण्ण रखनी होगी !

October 14, 2020 08:30 PM

डॉ कमलेश कली 

मीडिया जिसमें सभी प्रकार के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शामिल हैं, जो दूसरों के पर्दा फाश करने और धांधलियों को उजागर करने के निमित्त है,आज आपस में लड़ रहे हैं और टीआरपी के फर्जीवाड़े ने उनकी पोल खोल कर रख दी है। टीवी चैनलों की आपसी प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंदिता इस हद तक बढ़ गई है कि सब एक-दूसरे के गिरेबान पकड़ कालर तक पहुंच परस्पर बाल नोचने में लगे हैं। टीआरपी अर्थात टीवी रेटिंग प्वाइंट्स में गड़बड़ी कोई नई बात नहीं है। जैसे व्यावसायिक संस्थान अपनी बैलेंस शीट में विंडो ड्रेसिंग करते हैं, वैसे ही मीडिया संस्थान, अरबों खरबों के विज्ञापन बाज़ार को प्रभावित करने के लिए ऐसा पहले भी अलग तरीकों से  करते रहे हैं। पर अब मीडिया ने इस ध्रुवीकरण के दौर में ना केवल विज्ञापनों के लिए अपितु सत्ता के खेल में अहम भूमिका निभाने के लिए यह सब करते देखे जा सकते हैं तो उनके रोल पर अंगुली उठाना स्वभाविक है और उनसे प्रश्न पूछना अनिवार्य हो गया है। मुंबई पुलिस द्वारा टीआरपी रैकेट से पर्दाफाश करने पर उसी समय दो छोटे क्षेत्रिय चैनलों के मालिकों को तो गिरफ्तार कर लिया गया जबकि रिपब्लिक टीवी की संलिप्तता पर भी आरोप लगे थे,पर उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया और मज़े की बात यह कि इस चैनल पर जब पुलिस और प्रतिद्वंद्वी मीडिया का दबाव बढ़ा तो कुछ ही घंटों में देश की सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री का इस संदर्भ में बयान आ जाता है। इससे क्या साबित होता है, यही ना कि मीडिया सत्ता और बाजार व्यवस्था के आगे बौना है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। मीडिया का प्रश्न पूछने का अधिकार, जिसमें विशेष कर अर्णब गोस्वामी का यूनिक अंदाज कि"  पूरा राष्ट्र यह जानना चाहता है"देश सच जानना चाहता है, लेकिन आज उसी मीडिया से देश जवाब मांगा रहा है कि मीडिया में यह क्या हो रहा है?हम सत्य से दूर होते होते आज कहां पहुंच गए हैं। मीडिया जो स्वयं अपने संगठनों जैसे कि प्रैस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड, प्रेस एसोसिएशन, बार्डकास्ट एसोसिएशन है, प्रेस क्लब और पत्रकारों के प्रतिष्ठित संगठन उनकी गतिविधियों को नियंत्रित और नियमित करते  हैं । मीडिया अपने अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा स्वयं नहीं करेंगे तो संसद और सरकार  या अदालतें कौन करेगा, जबकि अपनी आजादी और सत्य जानने और लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उसे स्वयं अक्षुण्ण रखनी होगी। कहते हैं स्वनियमन और स्वनियंत्रण सबसे अच्छा तरीका है, दूसरे द्वारा नियंत्रित होना अपनी स्वतंत्रता को दांव पर लगाना है और स्वायत्तता गंवाने जैसा है। बाजार व्यवस्था और बाजार की ताकते  सब पब्लिक संस्थाओं पर हावी हो रही है, मीडिया भी उसका अपवाद नहीं है। आज मीडिया

 
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