Sunday, July 12, 2020
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Haryana

मकान - दुकान मालिकों और किरायेदारों की उलझने बढ़ी डॉ कमलेश कली

June 19, 2020 08:02 AM
मकान - दुकान मालिकों और किरायेदारों की उलझने बढ़ी 
डॉ कमलेश कली 

कोविड  19 लाकडाउन से जो समस्याएं पैदा हुई, उनमें अब तक मजदूरों, गरीब, निम्न मध्यवर्गीय समाज की परेशानियों और बदहाली की चर्चा रही, पर दुःख और बेबसी का आलम इस कदर पसरा है कि ,हर वर्ग को अपने में लपेट लिया है। एक जैसी खबर तीन बड़े शहरों से आई और ध्यान बरबस इस समस्या की ओर गया। सबसे पहले दिल्ली से,4 लाख से अधिक परिवार, जिसमें वाणिज्यिक प्रतिष्ठान भी शामिल है, किराया की देनदारी में उलझे हैं । ऐसे शोरूम और दुकान ,जिनका किराया लाख रुपए से अधिक है, बिक्री बिल्कुल नहीं हुई है, तो इतना किराया कहां से देंगे? इसी तरह खान मार्केट में जहां महीने का किराया 10लाख रुपए है, नकदी और आय के अभाव में, दुकानदारों के लिए सिरदर्दी बन गया है और बंद करने की नौबत आ गई है।कुछ इसी तरह की खबर चंडीगढ़ में नाईट फूड स्ट्रीट वालों ने भी चंडीगढ़ नगर निगम को किराया माफ करने के लिए लिखा है, लगभग तीन महीने से कोई भी धंधा नहीं होने से किराया चुकाने में असमर्थ हैं। मुंबई में इस उलझन को लेकर अब नए शर्त वाले किराये और लीज़ एग्रीमेंट बनाये जा रहे हैं।इन नये अनुबंधों में लाकडाउन संबंधित शर्ते पहले से ही लिखी जा रही है कि ऐसी स्थिति में किराएदार किराया नहीं चुका पाने पर, मकान/दुकान मालिक के पास कौन-कौन से विकल्प होंगे? मालिक अपने किराये की वसूली के लिए कोर्ट में भी जा रहे हैं लाकडाउन की अवधि के किराए में राहत के लिए एक पीआइएल  भी डाली गई, जिसे हाई  कोर्ट ने खारिज कर दिया है  यह कहते हुए कि किरायेदार और मालिक के बीच उनका निजी अनुबंध है, मालिक चाहे तो अपने निजी विवेक से किराया चुकाने की  शर्तों से किरायेदार को राहत दे सकता है, इस में कोर्ट कुछ नहीं कर सकती, कानून की दृष्टि से जो उनकी आपसी सहमति से जो कांट्रेक्ट हुआ है, उससे दोनो किराएदार और मालिक बाध्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हो सकता है कि मकान/दुकान  मालिक के पास केवल किराया ही एकमात्र आय का साधन हो। दरअसल आर्थिक क्रियाएं आपस में इतनी जुड़ी हुई है कि एक का नज़ला दूसरे पर पड़ता है,सब आपस में जुड़े हुए हैं, उत्पादन उपभोग, आय-व्यय,बचत निवेश, क्रय विक्रय आदि, एक व्यक्ति के लिए जो खर्चा है, दूसरे के लिए वही आमदनी का स्रोत है।यह समय बड़ा कठिनाइयों का है, इस समय सहन करना और एक दूसरे को सहारा देना बहुत जरूरी है। जीवन में तो"कुछ खो कर पाना है, और कुछ पा कर खोना है"का नियम निरंतर चलता रहता है।, मतलब तो टिके और डटे रहने से है, धुंध छट जाएगी तो उजाला होने में कितनी देर लगेगी 

इस संदर्भ में एक वाक़या है, जिसमें एक मां अपनी नव विवाहित बेटी को समझाती है। बेटी ससुराल से पहली बार अपने घर आती है तो अपनी मां के सामने शिकायतों का पुलिंदा रख कहती है कि वहां कुछ भी अच्छा नही है और वह ससुराल नहीं जाना चाहती। इस पर उसकी मां उसे रसोई में बुलाती है और उबलते पानी के पतीले में तीन चीजें गाजर,अंडा और कुछ  कॉफ़ी   के बीज क्रम से डालने के लिए कहती है। अब वो दिखाती है कि एक जैसे उबलते खौलते हुए पानी में गाजर बिल्कुल गल गई,अंडा कठोर हो गया और काफी के बीजों ने पानी का रंग भी बदल दिया और उसमें अपनी महक भी छोड़ दी। ऐसे ही विपरीत स्थितियों के आते ही कुछ तो गाजर की तरह गलने लगते हैं अर्थात इतने डर जाते हैं,घबरा जाते हैं कि अपना अस्तित्व ही खो  देते हैं। दूसरी तरह के लोग अंडे की तरह प्रतिक्रिया देते हैं, अर्थात इतने कठोर,कटु और निष्ठुर हो जाते हैं,पर तीसरी तरह के लोग कॉफ़ी  बीन्स की तरह होते हैं,रंग भी बदल देते हैं और अपनी छाप भी छोड़ देते हैं। विपरीत समय और प्रतिकूल माहौल में भी अपनी काबिलियत की रंगत और गुणों की महक से उसको खुशनुमा बना देते हैं। मुसीबतों से पाला जब पड़ता है, कुछ बिखर जाते हैं, कुछ निखर जाते हैं। कहते हैं निराशावादी हवा की गति की शिकायत करता है, आशावादी हवा के बदलने की उम्मीद रखता है, लेकिन यथार्थवादी हवा के साथ नाव का तालमेल बिठाता है। व्यवसाय जगत सबसे अधिक अस्थिर और निरंतर परिवर्तनशील माना जाता  है। आर्थिक मुश्किलें केवल शब्दों और मन के भावों से हल नहीं होती, यथार्थ बड़ा ही कटु, कठोर और निर्मम होता है। उसका सामना जब होता है तो बड़े  बड़ों की फूंक निकल जाती है।पर यह याद रखना चाहिए कि वृक्ष अपने पत्ते बदलता है, जड़ों को नहीं, ऐसे ही सिद्धांत नहीं बदलो।नीयत साफ और सुच्ची रखो। जिसका देना है,हाथ जोड़कर समय मांग ले, जैसे ही बिक्री बढ़ेगी, नकदी प्रवाह आयेगा, भुगतान कर देंगे। सब्र खुद भी रखें और जिनका देना है, आश्वासन दे और उन्हें भी सब्र रखने को कहें।कहते हैं मायूस न हो, इरादे न बदल,ये तो जिंदगी है पल में बदल जाएगी।
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