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कोरोना संकट में खाली सरकारी खज़ाने को भरेगे शराबी

May 06, 2020 11:08 AM

कोरोना संकट में  खाली सरकारी खज़ाने को भरेगे   शराबी 
डॉ कमलेश कली 
एक वाटसैप मैसेज " सरकार पर भरोसा सोच कर करियेगा, सरकार शराबियों के भरोसे "अर्थ व्यवस्था को ऊंचा उठाने की सोच रही है। अब गिरती अर्थव्यवस्था को उठाने में शराबियों की भूमिका पर चर्चाएं हो रही है। हरिवंश राय बच्चन की प्रसिद्ध कृति - मधुशाला की सहज स्मृति हो आई। उन्होंने मद्यपान के हर पहलू समाजिक, सांस्कृतिक, सृजनात्मक, पारिवारिक तथा अध्यात्मिक  पक्ष की व्याख्या की, पर कैसे शराब नोशी  कालांतर में सरकार के लिए राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत बन जाएगी , ये अछूता रह गया। लेकिन कोरोना कालखंड में सबसे पहले 40 दिन के लाकडाउन के बाद शराब की बिक्री खोलने, यहां तक कि रैडजोन में बाकी सब कुछ बंद है,पर शराब की दुकानें खोल दी गई है, सरकार के इस फैसले पर विमर्श शुरू हो गया है ।  शराब की बिक्री से प्राप्त आय  से सरकारों के  भारी भरकम  खर्च को पूरा करने में मदद मिलती है इसलिए गांधी के देश में शराब जरुरी और मजबूरी दोनों बन गई है। यूं ही नहीं कहते मजबूरी का नाम महात्मा गांधी।
पहले ही दिन शराब बिक्री में नये रिकॉर्ड बताते हैं कि नशाखोरी समाज में किस हद तक व्याप्त हैं, सोशल डिस्टैंसिंग की परवाह किए बिना शराब की दुकानों के आगे जुटी भीड़ ने,यह प्रमाण है कि जनता में यह लत कितनी बड़ चुकी है।कोरोना संकट में  पहले ही सरकार पुलिसराज में रुपांतरित हो गई है,अब शराबियों और पियक्कड़ों को कैसे अनुशासित करेंगे,ये देखना बाकी हैं। सरकार का यह तर्क कि शराब बंदी कभी भी कारगर नहीं हो सकती क्योंकि शराब की तस्करी और समानान्तर शराब तंत्र इसे विफल कर देते हैं।
देवदास उपन्यास के लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय जी से पूछा गया कि उन्होंने एक शराबी को नायक बना देवदास का महिमा मंडन किया है इससे  समाज में शराब पीने की लत बड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि मैंने तो उपन्यास में एक शराबी की क्या दुर्गति होती है, इस का वर्णन किया है,  संपन्न , संभ्रांत ठाकुर को  तड़पते मरते दिखाया गया ताकि  लोग तौबा करें कि शराब लत  का यह हश्र होता है। ठीक उसी तरह सरकार 70%टैक्स लगा कर सोचती है कि लोग शराब नहीं पीएंगे। पर शराब पीने वाले नहीं पीएंगे तो हमारी सरकार का सफेद हाथी कैसे चलेगा

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