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कोरोना बदल सकता है सियासी मुद्दों की रंगत

March 26, 2020 06:18 AM

COURTESY NBT MARCH 26

कोरोना बदल सकता है सियासी मुद्दों की रंगत


विशुद्ध राजनीति
कसौटी
नरेन्द्र नाथ

कोरोना वायरस देश में अब तक की सबसे बड़ी विपदा के रूप में सामने आया है। कहा जा रहा है कि यह वायरस देश के सामने पिछले सौ सालों की सबसे बड़ी चुनौती है, जिसमें पहले लोगों की सेहत का सवाल है और फिर उससे निपटने के बाद आर्थिक सेहत से भी जूझना होगा। यह लड़ाई लंबी चलने वाली है और इसी लड़ाई के दौरान इस बात की भी परीक्षा होगी कि देश के अंदर मौजूद स्वास्थ्य व्यवस्था इस वायरस से निपटने में कितनी सक्षम है। जब हालात सामान्य होंगे, तब लोग इस संकट से जूझने वाली सरकार को आंकेंगे भी और उसी अनुरूप सरकार का भविष्य भी तय करेंगे। देश में स्वास्थ्य का मुद्दा राजनीति में हमेशा से हाशिये पर रहा है। कोरोना वायरस के जाने के बाद यह मुद्दा हाशिये से निकलकर ऊपर आ सकता है और वोटरों के लिए निर्णायक मुद्दा बन सकता है। कुल मिलाकर इतना तो साफ है कि कोरोना के बाद अब देश के अंदर बहुत कुछ बदलने वाला है और सियासत भी इससे अछूती नहीं रह पाएगी।

 

प्राथमिकता में नहीं सेहत

अगर देश के अंदर अब तक उठे राजनीतिक मुद्दों की बात करें, तो सेहत का सवाल लोगों की प्राथमिकता में लगभग नहीं के बराबर ही रहा है। दुनिया भर में भारत की स्वास्थ्य सेवा सबसे बदतर सेवाओं में शामिल मानी गई है। हालात यह हैं कि पूरे देश में पांच लाख से अधिक डॉक्टरों की कमी है। दस हजार से अधिक लोगों की आबादी पर महज एक डॉक्टर की सेवा मिलती है। इसका नतीजा यह है कि इलाज आम लोगों की पहुंच से दूर होता गया है। इसके बावजूद जनता ने नेताओं और राजनीतिक दलों से इस विषय पर सवाल ना के बराबर ही पूछे हैं। इसी वजह से राजनीतिक दल और सरकारें सेहत का जमीनी मुद्दा दरकिनार करने में अब तक सफल रहे। मौजूदा सरकार की ही बात करें तो इस मसले की उपेक्षा की एक मिसाल यह भी है कि स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर पिछले तीन वर्षों में देश की कुल जीडीपी की 1.2 फीसदी से लेकर 1.5 फीसदी तक की राशि ही खर्च की जाती रही है, जबकि रक्षा पर इसके मुकाबले तीन गुने से अधिक खर्च होता रहा है। विशेषज्ञों ने इस मसले पर कई बार सवाल उठाए, लेकिन अभी तक यह कागजी डिबेट ही बनती रही है। चंद महीने पहले आई यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल आठ लाख बच्चे मर जाते हैं, जो पूरे विश्व मंष सबसे अधिक हैं। लेकिन यह चिंता कभी राजनीति की मुख्यधारा में शामिल ही नहीं हुई। अब कोरोना के बाद शायद ऐसा संभव नहीं रह जाएगा। कोरोना के बीच ही पूरे देश में अस्पताल और स्वास्थ्य संसाधनों की हकीकत सरकारों को सामने आकर स्वीकार करनी पड़ी है।

अगर स्वास्थ्य मुद्दों और आम वोटरों की प्राथमिकता की बात करें, तो अब तक आए तमाम सर्वे में यह कभी भी पहले पांच प्रभावी मु्द्दों में शामिल नहीं रहे। आम चुनाव 2019 के बाद सी वोटर की ओर से किए गए विश्लेषण के अनुसार स्वास्थ्य वोटर के लिए सातवीं प्राथमिकता थी। महज एक फीसदी लोगों ने वोट देने से पहले इस मुद्दे को प्राथमिकता में लिया था। लेकिन कोरोना संकट के बाद इस एक फीसदी की तादाद में बड़ी वृद्धि होने वाली है। पूरे विश्व में इस बीमारी के खिलाफ अलग-अलग देशों की सरकारों के पक्ष और विपक्ष में लोग आने लगे हैं। तीन दिन पहले आए एक ग्लोबल सर्वे में अधिकतर लोगों ने कहा कि वे सरकार को इस मसले पर उठाए गए कदमों के आधार पर नापेंगे और अगले चुनाव में उनके वोट के फैसले का भी यही आधार होगा। दरअसल महामारी की विपदा भारत जैसे कई देश राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार झेल रहे हैं। 1917 के बाद पहली बार ऐसा मसला सामने आया है। बीच में गुजरात में प्लेग का मामला आया, लेकिन वह एक राज्य के एक शहर तक ही सीमित रहा।

 

लोगों के लिए अहम सवाल

हाल के समय में देश की राजनीति में स्वास्थ्य से जुड़े मसले मुद्दे के रूप में उभरते रहे हैं। बिहार में चमकी बुखार से होने वाली मौतें हों या उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जापानी बुखार से हुई बच्चों की मौत या फिर राजस्थान के अस्पतालों में हुई बच्चों की मौत, इन सभी मामलों के बाद राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का मसला तेजी से उठा। इस पर राजनीति भी हुई। इसके साथ ही सरकार और राजनीतिक दलों ने स्वास्थ्य को अपने अजेंडे में लेना शुरू किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 आम चुनाव में आयुष्मान योजना को अपनी सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना के रूप में पेश कर इस पर वोट मांगा। इसमें गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा करने का प्रावधान है। इसके अलावा आवश्यक दवाओं की कीमतें ही नहीं, स्टेंट और मेडिकल उपकरणों के मूल्य भी तय किए गए।

2019 में आम चुनाव के बाद आए विश्लेषण में यह बात सामने आई कि लोगों ने स्वास्थ्य पर की गई पहल को नोटिस किया था, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें इससे अधिक की अपेक्षा थी। इसी तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने मोहल्ला क्लिनिक को अपने मॉडल ऑफ गवर्नेंस के चेहरे के रूप में पेश किया। इसका लाभ भी मिला। तमाम मुद्दों के बीच दिल्ली की जनता ने इसे सही दिशा में एक कोशिश बताते हुए वोट दिया। अभी अमेरिका में हो रहे नए राष्ट्रपति के चुनाव में भी महंगा इलाज अब तक का सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है। वहां डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन- दोनों ही स्वास्थ्य से जुड़े मसले उठा रहे हैं। अमेरिकी मीडिया के अनुसार वहां आम लोगों का इलाज पहली बार इतना बड़ा मुद्दा बना है। हालांकि अमेरिका के पूर्व प्रेसीडेंट बराक ओबामा की लोकप्रियता स्वास्थ्य मुद्दे पर ओबामा केयर लाने के बाद ही तेजी से बढ़ी थी

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