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क्यो न इतना कहना माने कि अन्दर रहे

March 25, 2020 04:15 PM

  क्यो न इतना कहना माने कि अन्दर रहे
आज मानव जाति अनबूझे खतरे से जूझ रही है, बहुत नाज़ुक वह कठिन समय है। मनुष्य समाजिक प्राणी है, परन्तु उसे स्वयं व  समाज के लिए ही अलग थलग रहने को कहा जा रहा है।कोरोना महामारी के भयंकर रूप ने सामुदायिक व्यवस्था पर तो वार किया ही है वहीं अर्थ प्रधान, भौतिक वादी अर्थ व्यवस्था , स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय, देशों की  , पूरे विश्व की आर्थिकी डगमगा रही है।GIG economy जो आधुनिक अर्थ प्रणाली है, पूरी तरह से धराशाई हो गई है उदाहरण स्वरूप उबर ओले ,जमैटो,बीएनबी आदि के गिग वर्कर्स अपने रोजगार को चुके हैं। आर्थिक समस्याएं न केवल आज की घड़ी में है, अपितु इनके दूरगामी परिणाम होंगे। पूरी दुनिया दुःख में कराह रही हैं, कोई जिंदा रहने के लिए तो कोई मृत्यु से जद्दोजहद कर रहा है। परिणाम  विश्व युद्ध के समान भयावह है। भारत के प्रधानमंत्री हाथ जोड़कर देशवासियों को अन्दर रहने की भीख मांग रहे हैं, तो इटली के प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से आंसू बहा , अपनी असमर्थतता जता रहे हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते।  लोगो को बिना इलाज के मरने के लिए छोड़ देने के वीडियो दिल दहला देने वाले हैं। मनुष्य आज घुटने टेके, अपने तथा पराये,सब का मंगल हो, करबद्ध प्रार्थना कर रहा है, सलामत रहे की दुआ मांग रहा है।
प्रकृति के भी बदला लेने के अपने ही ढंग है। गुलज़ार साहब के शब्दों में,"सड़कों पर पसरा सन्नाटा बताता है कि प्रकृति मनुष्य जाति से बेहद नाराज़ हैं" हर तरफ उदासी फैली है, गमगीन माहौल को दर्शाते नगमे "देख तेरे इन्सान की हालत क्या हो गई भगवान" या "महल उदास और गलियां सूनी, चुप-चुप है दीवारें,मन का उजड़ा, दुनिया उजड़ी,रूठ चुकी है बहारें" हवा में तैर रहे हैं। चांद और मंगल ग्रह पर अपना आशियाना बनाने को आतुर मानव आज पृथ्वी पर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को बेबस है।
जिन्दगी यूं जलेबी की तरह इतनी उलझ सी गई है तो क्यो न इसे चाशनी में डुबोया जाएं, अर्थात जो जहां है, अपने घर मे  21दिन अंदर रहे,लक्षमण रेखा पार न करें के आदेश को पालन करें। पहले तो अक्सर ये हम ललकार कर कहते रहे कि"ऐ जिन्दगी मैं  हर रोज हर दम समझौता क्यूं करूं,माना कि मुझे जीने का बहुत शौक है, पर इतना भी नहीं कि मर मर कर जिऊं" पर आज बानगी बदल गई है।
कहते हैं कि चील की विशेषता होती है कि जब तुफान आने से पूर्व उसे आभास होता है तो वह उसी वक्त उड़ान भर बहुत ऊंचा उड़ जाती है, छिपने या बचने की अपेक्षा, अपने पंखो पर भरोसा कर आसमान में बहुत ऊपर ऊंचे पहाड़ पर स्थित कर लेती है।तो सीखने वाली बात यह है कि विपरीत परिस्थितियों को भी कैसे अनुकूल बनाया जा सकता है। बचाव व छिपाव- की बजाय चील उड़ान में भरोसा रखती है। आज हमें उसी साहस न सकारात्मक सोच की जरूरत है।
कोरोनावायरस के खिलाफ तो ज़ंग लड़नी ही होगी, घर के अंदर बैठ कर, अपने समय का सार्थक प्रयोग करें।मंदी में आती अर्थ व्यवस्था नीचे गोते लगा रही है, रोजगार, निवेश,लाभ सब नीचे की ओर मुंह किए हैं, वैश्विक समीकरण बदलेगे,,इस आपदा से उबरने पर नये अवसर भी सामने आयेंगे। उसमें तो समय ही कुछ करेगा, पर एक व्यक्ति की हैसियत से उसे अपनी जीवन शैली बदलने का अच्छा मौका है। हम जिंदा है, इसका आभार प्रकट करते हुए, प्रकृति जो हमें संदेश दे रही है, उसे सुने, गति ही सब नहीं होती,रूक कर सोचने का समय मिला है। व्यक्तिगत सफाई और सच्चाई - आन्तरिक वह बाहरी दोनों पर ध्यान दें। परिवार के साथ समय बिता कर रिश्तों का सुख प्राप्त करे। अपने स्वास्थ्य और जीवन के महत्व को समझ जो कहा जा रहा है, उसे माने, नियमो का पालन करें। आज मानव को बाहर का छोड़, अपने अंदर से पाने का  हौसला रखना होगा, क्यों कि बाहर निकलने में खतरा है,भय व आंशका है, कोरोनावायरस के संक्रमण का जाल बिछा है। अंदर रहने में ही सब का बचाव है।
डा. क. कली  

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