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National

कोरोना में कीर्तन से करूणा की ओर

March 23, 2020 12:27 PM

  कोरोना में कीर्तन से करूणा  की ओर
रविवार "जनता कर्फ्यू' में शाम पांच बजे प्रधानमंत्री द्वारा पांच मिनट के लिए तालियां बजाने का आह्वान, जनता के लिए एक अलग प्रकार का अनुभव सिद्ध हुआ। सब अपने घरों की खिड़कियों के पास, बाल्कनियो़ में  खड़े होकर तालियां बजाते, घण्टियां बजाते ,थाली बजाते, यहां तक कि लोगो को शंख, ढोल, मृदंग,झांझ , मंजीरा आदि बजा कर ध्यान बंटाते देखा गया। किसी ने इसको ध्वनि विज्ञान से जोड़ा तो किसी ने इसे रेवती नक्षत्र में नाद कर, ज्योतिषीय उपाय के तौर पर देखा। छोटे बड़े, बच्चे जवान और बूढ़े, स्त्री पुरुष, पढ़ें अनपढ़े सब ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। अपने को ज्यादा विवेकशील समझने वाले लोग भी इस मजमे को कैमरे में कैद करके विशेष बनाने में लगे देखें गये।
हालांकि प्रधानमंत्री ने इसे अंधविश्वास के दायरे से बाहर स्वास्थ्य कर्मियों, पुलिस तथा प्रशासन जो कि पूरे दिन मुस्तैदी से ड्यूटी कर रहे हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लक्ष्य से पांच मिनट निकालकर उनके लिए तालियां  थालियां बजाकर आभार व्यक्त करने को कहा था। कुछ लोग डर कर ये सब कर रहे थे कि शायद तालियां बजाने से कोरोनावायरस असर नहीं करेगा।
फिर भारतीय तो भारतीय हैं न, अपने अंदाज में हर स्थिति  परिस्थिति में अपनी अलग हल या जुगाड़ करेंगे।हम सबको इतनी ज्यादा सक्रियता, भागदौड़, आपाधापी की आदत हो गई है कि पूरा दिन घर में बंद रहना दुश्वार हो गया और ये पांच बजे का समय अपने आप को धर्म-कर्म करने का अवसर बन गया। पंजाबियों को नयी बोलीया‌ंतालियों के साथ बनाने काम मिला तो किसी ने थाली पंखे से लटका निरन्तर टकटक की आवाज करने का तरीका ईजाद किया।उत्साह देख ये लगा मानो इतने शोर से डर कर कोरोनावायरस भाग ही जाएगा। काश ऐसा हो सकता, इस वायरस ने पूरे विश्व को भयभीत कर रखा है, चिकित्सा क्षेत्र में तो बड़ी चुनौती है ही, ये तो मानव के अस्तित्व को ललकार रहा है। विश्व में इसका बढ़ता संक्रमण विकसित तथा विकास शील सभी देशों को नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। अर्थ व्यवस्था, समाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था पर तो गंभीर प्रभाव होंगे ही,माना जा रहा है कि इस महामारी से उबरने के बाद, जबकि अभी निकट भविष्य में हल नज़र नहीं आ रहा है, पूरी दुनिया की तस्वीर बदल देंगी।एक छोटे-से वायरस ने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है, इस के सामने अमीर देशों की दादागिरी, आतंकवाद,न्युकलीयर बाम्बस,सब बौने हो गये है। बहिमुर्खी मानव आज डर कर दुबक कर अंदर घुसने को मजबूर हैं।इस छोटे से जीव ने अपनी प्रलयकारी शक्ति से आदमी को उसकी औकात बता दी हैं।हम आपस में कितने जुड़े हुए हैं,हम एक दूसरे पर कितने निर्भर है,पर अपनी सुरक्षा के लिए, अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अलग थलग रहने को विवश है तथा एक दूसरे के लिए अछूत बन, एक दूसरे की सांस से भी दूर भाग रहे हैं। वैज्ञानिक प्रगति तथा
तकनीकी बढ़त, मनुष्य की अदम्य जिजीविषा निश्चय ही इस महामारी पर काबू पा लेगे, पर समय रहते, सतर्क रह,होश में आ पुनः जीवन की प्राथमिकताओं पर चिन्तन आवश्यक है। कोरोना जीवन में "करूणा "बन जाए अर्थात हम है तो सब है,सब है तो हम है,, जीवन है तो सब है,सब का जीवन महत्वपूर्ण है,ऐसी समावेशी तथा सकारात्मक सोच ही मानव को सुरक्षित तथा उज्जवल भविष्य की ओर ले जा सकती हैं। अंत में, शिव मंगल सिंह की ये पंक्तियां"गति प्रबल पैरों में भरी, फिर क्यूं रहे दर पर खड़ा, आज मेरे सामने रास्ता इतना पड़ा"
आज रास्ता बाहर नहीं, अन्दर की तरफ जाने का है, सोचने, विचार ने, मंथन करने का है कि कैसे बीमारी में दुःखी, तप्त, त्रासित जीवन में सुख और शांति की फुहार लाई जा सके ।
डा. क.कली  

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