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Editorial

अब अकेले ही दुनिया घूम रही हैं महिलाएं

January 25, 2020 06:26 AM

COURTESY NBT JAN 25

अब अकेले ही दुनिया घूम रही हैं महिलाएं
रहने दो हमसफर

 

सर्वेक्षणों का निष्कर्ष
लंबे सफर पर अकेले निकलने वालों में पुरुषों से कहीं बड़ी तादाद आज महिलाओं की है। सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक बाधाएं वैश्विक स्तर पर उनके लिए बेमतलब हो चुकी हैं। किसी के साथ रहकर नहीं, अपनी आंखों से, अपने तरीके से संसार को देखना उनके अजेंडे पर है। ट्रैवलिंग साइट ‘101 हॉलिडेज’ ने अपने एक सर्वेक्षण के आधार पर कहा है कि छुट्टियों में घूमने जाने वाले अकेले लोगों की संख्या में अभी 10 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी हो रही है और ऐसे पर्यटकों की कुल तादाद में 68 फीसदी महिलाएं हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो छुट्टियों का आनंद अब औरतें अकेले लेना चाहती हैं। पहले यह काम वे परिवार या दोस्तों के साथ करती थीं, पर अब वे इसके साथ जुड़े दबावों से मुक्त हो रही हैं। जिस तरह जीवन के बाकी फैसले वे खुद करना चाहती हैं, उसी तरह घूमने को लेकर स्वतंत्र नजरिया भी रखती हैं। परिवार के साथ घूमते हुए अक्सर महिलाओं का ध्यान बच्चे संभालने में लगा रहता है। फिर कहां घूमना है, यह निर्णय भी परिवार के हिसाब से होने लगता है। इसी तरह समूह में घूमने पर कई बार व्यक्तिगत इच्छाओं को मारना पड़ता है और सामूहिक निर्णय को स्वीकार करना पड़ता है। जबकि अकेले में यह स्वतंत्रता रहती है कि व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी स्थान को देर तक या बार-बार देखे, अपने हिसाब से अपना रहना-खाना तय करे। सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रक्रिया ने स्त्रियों में स्वतंत्र रूप से जीने की जो प्रबल इच्छा पैदा की है, उसका प्रभाव भारतीय महिलाओं पर भी देखने को मिल रहा है। ‘ब्रिटिश एयरवेज’ ने 2018 की एक सर्वे रिपोर्ट में कहा था कि भारतीय महिलाओं में 47 प्रतिशत अकेले यात्रा करती हैं। गुड़गांव स्थित हॉस्टल कंपनी जॉस्टल के एक सर्वे के अनुसार 2015 से 2018 के बीच देश में महिला पर्यटकों की संख्या में 399 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिनमें 322 प्रतिशत हिस्सा अकेले घूमने वाली महिलाओं का है। जाहिर है, देश के भीतर भी बहुत सारी महिलाएं अकेले घूम रही हैं। अभी बीसेक साल पहले तक महिलाओं का अकेले कहीं जाना बहुत मजबूरी में ही हो पाता था, पर आज यह आम बात हो चुकी है। नब्बे के दशक में भूमंडलीकरण और उदारीकरण से भारतीय समाज का मन भी खुलता गया है। लड़कियों का घर से बाहर निकलकर नौकरी और कारोबार करना अच्छा माना जाने लगा, और अब लोग उन्हें पर्यटक के रूप में अकेली देखने के अभ्यस्त हो रहे हैं। पर इस प्रवृत्ति का नीचे तक पहुंचना बाकी है। जॉस्टल के अनुसार बंगलुरु, दिल्ली, मुंबई, पुणे और चेन्नई की औरतें ही ज्यादातर सिंगल टूरिस्ट के रूप में आती हैं। यह मामला एक स्तर पर स्त्री के सशक्तीकरण से भी जुड़ा है। ज्यों-ज्यों देश के बाकी इलाकों और वर्गों में इनकी ताकत बढ़ेगी, उनमें दुनिया को अपनी नजर से देखने का जज्बा भी बढ़ेगा।

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