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Haryana

मुख्य सचिव स्तर की हो चुकी तीन बैठकें, मसला सुलझाने को दोनों राज्यों के नेता साथ बैठे ही नहीं

January 25, 2020 06:04 AM

COURTESY DAINIK BHASKAR JAN 25

मुख्य सचिव स्तर की हो चुकी तीन बैठकें, मसला सुलझाने को दोनों राज्यों के नेता साथ बैठे ही नहीं

नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में फैसला पहले ही हरियाणा के हक में आ चुका है। पहले केंद्र के साथ बैठक भी हुई है। पानी हरियाणा में आना चाहिए। सरकार प्रयास करे, हम साथ हैं।
एसवाईएल : पानी न देने के पंजाब के फैसले के खिलाफ हरियाणा फिर जाएगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दिया था आपस में बैठकर मसले का हल निकालने का निर्देश
मनोज कुमार | राजधानी हरियाणा
एसवाईएल मामले को सुलझाने में सियासत आड़े आ रही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की ओर से केंद्र सरकार को दोनों पक्षों में बातचीत से मसला हल कराने के आदेश दिए थे। इसके बाद मुख्य सचिव स्तर की केंद्र की मध्यस्थता से तीन बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन कोई निर्णय नहीं हुआ। क्योंकि पंजाब पहले ही मूड बना चुका था कि हरियाणा को पानी नहीं देगा। ऐसे में मुख्यमंत्री या मंत्री स्तर पर कोई वार्ता नहीं हुई।
पंजाब की गुरुवार को हुई सर्वदलीय बैठक में साफ कह दिया कि हरियाणा को पानी नहीं दिया जाएगा, जबकि दूसरी तरफ हरियाणा पानी लेने के लिए अड़ा है। अब हरियाणा एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में एक्जीक्यूशन डालेगा, क्योंकि हरियाणा की ओर से दो-तीन दफा पंजाब को बैठकर बातचीत के लिए भी लिखा था लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। सरकार खुद के लिए पंजाब की बैठक को अच्छा बता रही है, क्योंकि अब बातचीत का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और वह दाेबारा सुप्रीम कोर्ट जाकर फैसला लागू कराने की मांग करेगा। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने एक दिन पहले ही कहा है कि अब केंद्र सरकार की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट जाएगा कि हम प्रयत्न कर चुके हैं और सहमति नहीं बन रही है। ऐसे में अब तो केवल किस प्रकार से कौन बनाएगा, इस पर बात होनी है। इस पर सियासत भी गरमा गई है। इस पर इनेलो विधायक अभय सिंह चौटाला ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद किंतु-परंतु नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे हरियाणा में सभी दलों की बैठक बुलाए। सभी को लेकर पीएम से मिलना चाहिए। मुख्यमंत्री ने मामले को लेकर कुछ नहीं किया।
केंद्र से सुप्रीम कोर्ट जाएगा एफिडेविट; प्रयास कर चुके, सहमति नहीं बनी
यह भी जानें: एक नवंबर, 1966 को हरियाणा को संयुक्त पंजाब से अलग किया गया। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत पानी का बंटवारा नहीं हुआ। इसलिए शुरू से ही पानी को लेकर विवाद हो गया। बाद में केंद्र ने अधिसूचना जारी कर हरियाणा को 3.5एमएफ पानी दिया गया। जिसके लिए 212 किलोमीटर लंबी एसवाईएल नंबर बनाने का निर्णय हुआ। जिसका 91 किलोमीटर हिस्सा हरियाणा और बाकी पंजाब में बनना था। हरियाणा ने अपने हिस्से का काम कुछ सालों में ही निर्माण कर दिया लेकिन पंजाब ने नहीं किया।
प्रदेश में 9 से निकालेंगे यात्रा : सत्यवीर
दो जमा पांच आंदोलन के अध्यक्ष सत्यवीर हुड्‌डा ने कहा कि एसवाईएल पानी संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में दिल्ली में धरना दिया जाएगा। पानी लाने के पक्ष में 9 से हरियाणा में रोहतक से यात्रा की शुरुआत की जाएगी।
जानिए... कब क्या हुआ
वर्ष 1955 में भारत और पाकिस्तान के बीच रावी-ब्यास को लेकर पानी बंटवारा हुआ। इसमें 7.20 एमएफ पंजाब, 8 एमएफ राजस्थान, 0.65 एमएफ जम्मू कश्मीर का हिस्सा बताया गया। 1966 में हरियाणा अलग हुआ। 1976 में केंद्र ने अधिसूचना जारी करके हरियाणा के लिए 3.5 एमएएफ पानी दिया। कुछ समय बाद फिर बंटवारा हुआ। इसमें पंजाब का हिस्सा 4.11 एमएफ व हरियाणा का 3.50 एमएफ निर्धारित किया। राजस्थान, जम्मू कश्मीर का हिस्सा तय किया था। अप्रैल 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटियाला के कपूरी गांव के पास नहर खुदाई के काम का उद्घाटन कर दिया था, लेकिन वहां विरोध हो गया और पंजाब में स्थिति बिगड़ गई थी। 1985 में राजीव-लौंगोवाल समझौता हुआ तो पंजाब ने नहर बनाने की सहमति दी। करीब 11 साल तक नहर पर काम नहीं हुआ तो हरियाणा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 2002 में कोर्ट ने पंजाब को एसवाईएल बनाने के निर्देश दिए। पंजाब ने फिर याचिका लगाई तो 2004 में खारिज हो गई। पंजाब ने विधानसभा में पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट-2004 बनाकर जल समझौते रद्द कर दिए। तभी से मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। 2015 में भाजपा सरकार बनने पर फिर मामले को खोला गया। 2016 में 5 जजों की पीठ ने दोनों पक्षों को बैठकर हल निकालने के निर्देश दिए थे।
सरकार प्रयास करे, हम साथ हैं: हुड्‌डा
सुप्रीम कोर्ट को एक्जीक्यूशन ऑर्डर देना है: सीएम
सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर में था कि सहमति से रास्ता निकाला जाए। पंजाब की सर्वदलीय बैठक के बाद अब सुप्रीम कोर्ट से जल्द निर्णय आएगा। पानी समझौते को मान्यता मिली है। अब केवल सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को एग्जिक्यूट करवाने के लिए स्वयं सुप्रीम कोर्ट को एक अपना एक्जीक्यूशन ऑर्डर देना है। -मनोहर लाल, मुख्यमंत्री।

 
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