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लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में 2030 तक एस.सी./एस.टी. आरक्षण हेतु 126 वां संशोधन विधयेक, 2019 आज संसद में हुआ पेश

December 09, 2019 01:16 PM

चंडीगढ़ - संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आज लोकसभा में संविधान में संशोधन करने हेतु 126 वां संशोधन विधयेक, 2019 पेश किया। गौरतलब है कि गत सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में लिए गए अन्य फैसलों के साथ साथ यह भी निर्णय लिया गया कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओ में अनुसूचित जाति (एस.सी.) और अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) के लिए सीटों का आरक्षण, जो अगले वर्ष 25 जनवरी, 2020 को समाप्त हो रहा था, उसे 10 वर्ष के लिए और अर्थात 25 जनवरी 2030 तक बढ़ाया जाएगा।पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने इस बारे में अध्ययन कर कानूनी जानकारी देते हुए बताया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में क्रमश: लोक सभा और राज्य विधानसभाओ में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के व्यक्तियों के लिए देश और प्रदेश में उनकी जनसँख्या के अनुपात में उपयुक्त सीटें आरक्षित करने का उल्लेख एवं प्रावधान है।उन्होंने बताया कि लोक सभा में इस समय कुल 543 सीटों में से अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें आरक्षित है अर्थात कुल 131 सीटें आरक्षित हैं जबकि वर्ष 2009 लोक सभा आम चुनावो से पहले यह संख्या 120 होती थी जिसमे 79 अनुसूचित जाति और 41 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होती थी। उन्होंने आगे बताया की उक्त दो प्रावधानों के बाद आने वाले अनुच्छेद 334 में ऐसे आरक्षण की समय सीमा हालांकि मूल रूप से तो संविधान लागू होने के मात्र 10 वर्ष तक के ही की गयी थी अर्थात 25 जनवरी 1960 तक परन्तु सर्वप्रथम वर्ष 1959 में संसद द्वारा संविधान की इस अनुच्छेद में संशोधन कर इस समय सीमा को संशोधित कर 20 वर्ष अर्थात 25 जनवरी 1970 तक, फिर 1969 में दोबारा संशोधन कर 30 वर्ष अर्थात 25 जनवरी 1980 तक, फिर वर्ष 1980 में संशोधित कर 40 वर्ष अर्थात 25 जनवरी 1990 तक, फिर वर्ष 1989 में संशोधन कर 50 वर्ष अर्थात 25 जनवरी 2000 तक, इसके बाद वर्ष 1999 में फिर संशोधित कर 60 वर्ष अर्थात 25 जनवरी, 2010 तक और आज से दस वर्ष पहले वर्ष 2009 में संशोधित कर 70 वर्ष अर्थात 25 जनवरी 2020 कर दिया गया था जिसे अब संशोधित कर 80 वर्ष अर्थात 25 जनवरी 2030 तक कर दिया जाएगा। हालांकि उन्होंने बताया यह अभी स्पष्ट नहीं है कि क्या लोक सभा और राज्य विधानसभाओ में एस.सी./एस.टी. के आरक्षण के 10 वर्ष और विस्तार की साथ साथ एंग्लो-इंडियन वर्ग के व्यक्तियों का विशेष प्रतिनिधित्व भी दस वर्ष के लिए और बढ़ाया जाएगा।सनद रहे कि भारत के राष्ट्रपति लोक सभा में 2 एवं राज्य के राज्यपाल प्रदेश की विधानसभा में 1 एंग्लो-इंडियन को क्रमश: सांसद और विधायक के रूप में मनोनीत कर सकते हैं जिनके लिए संविधान के अनुच्छेद 331 और 333 में प्रावधान है। गौरतलब है कि मौजूदा 17 वी लोकसभा में अभी तक मोदी सरकार ने 2 एंग्लो-इंडियन सांसद मनोनीत नहीं करवाए हैं। बहरहाल, हेमंत ने बताया कि चूँकि अगले महीने यह समय सीमा समाप्त हो रही है एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, जिसकी विधानसभा की कुल 70 में से 12 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, के अगले विधानसभा आम चुनाव 22 फरवरी 2020 से पहले संपन्न करवाने कानूनन आवश्यक हैं, इसलिए संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र, जिसकी अवधि आगामी 13 दिसंबर तक ही है, में ही मोदी सरकार द्वारा संविधान संशोधन विधयेक दोनों सदनों से पारित करवा लिया जाएगा ताकि 25 जनवरी 2020 से पहले ही इस पर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर इसे लागू किया जा सके।रोचक बात यह है कि केवल विपक्षी कांग्रेस ही नहीं बल्कि कोई भी विपक्षी राजनीतिक दल इस विधेयक का तनिक भी विरोध नहीं करेगा। हेमंत ने यह भी बताया कि भारत के संसदीय लोकतंत्र बनने के बाद अब तक संसद द्वारा चार परिसीमन आयोग बाबत कानून बनाया गया है एवं यह आयोग वर्ष 1952, 1963, 1973 एवं 2002 में बनाये गए जिन्होंने लोक सभा और राज्य विधानसभा की सीटों की कुल और आरक्षित सीटों की संख्या का अवलोकन और पुनर्निर्धारण किया हालांकि वर्ष 2001 में हुए संविधान संशोधन के फलस्वरूप ऐसी अगली कवायद वर्ष 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आंकड़ों के प्रकाशित होने के बाद अर्थात 2031 के बाद ही संभव हो पाएगी जिसका अर्थ है लोकसभा और राज्यों की विधानसभा की मौजूदा कुल सीटें ही तब तक के लिए वर्तमान जैसी ज्यों की त्यों कायम रहेंगी। जहाँ तक हरियाणा का विषय है, तो इस समय राज्य में लोक सभा की कुल 10 लोकसभा सीटों में से दो- अम्बाला और सिरसा लोक सभा हल्का जबकि विधानसभा की कुल 90 सीटों में से 17 हलके अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों लिए आरक्षित है जिनमें अम्बाला ज़िले में मुलाना, यमुनानगर में साढौरा, कुरुक्षेत्र में शाहाबाद, कैथल में गुहला, करनाल में नीलोखेड़ी, पानीपत में इसराना , सोनीपत में खरखौदा, जींद में नरवाना, सिरसा में कालांवाली, फतेहाबाद में रतिया, हिसार में उकलाना, भिवानी में भवानी खेरा, झज्जर में झज्जर सीट, रोहतक में कलानौर, रेवाड़ी में बावल, गुडगाँव (गुरुग्राम) में पटौदी और पलवल में होडल हैं। इस समय प्रदेश के 22 ज़िलों में 5 ज़िलों महेंद्रगढ़, फरीदाबाद, पंचकूला, नूहं और चरखी दादरी में कोई भी विधानसभा सीट आरक्षित नहीं है।हेमंत ने बताया कि अक्टूबर, 2009 के हरियाणा विधानसभा आम चुनावो से पहले भी प्रदेश में विधानसभा की कुल आरक्षित सीटें 17 ही थी हालांकि करनाल में जुंडला, पानीपत में असंध, यमुनानगर में रादौर, सोनीपत में बरोदा, कैथल में कलायत,फरीदाबाद में हसनपुर, सिरसा में ऐलनाबाद और डबवाली भी आरक्षित होती थी परन्तु परिसीमन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत हुई कयावद में यह हलके या तो समाप्त हो गए या इनके अनारक्षित कर दिया गया था।

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