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Haryana

DAINIK BHASKAR -किसान की क्रय-शक्ति से पता चलता है मंदी का

November 19, 2019 05:43 AM


COURTESY DAINIK BHASKAR NOV 19
किसान की क्रय-शक्ति से पता चलता है मंदी का
वैश्विक मंदी तेजी से भारत को भी अपने लौहपाश में जकड़ सकती है। सरकार सक्षमता और सही सोच से इस संकट से देश को निकाल सकती है, बशर्ते वह हकीकत के प्रति 'शुतुरमुर्गी भाव' न रखे। 2009 में भी ऐसा संकट था, लेकिन भारत उससे उबर गया था। आज भी जरूरत है इस मंदी के चक्र को तोड़ने की और तरीका एक ही है। कृषि और उससे जुड़े लोगों के हाथ में पैसा जाए, जो देश की आबादी का 67 प्रतिशत हैं। सरकार की ही ताजा रिपोर्ट के अनुसार ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल ही नहीं, रोजाना प्रयोग वाली उपभोक्ता सामग्री (तेल, साबुन आदि) की मांग ग्रामीण भारत में लगातार घटती जा रही है। यह क्षेत्र देश में 5 प्रतिशत रोजगार देता है। अगर मांग कम होगी तो उद्योग उत्पादन कम करेंगे और बेरोजगारी बढ़ेगी। उधर, देश की वित्तमंत्री ने एक साक्षात्कार में कहा है कि बड़ी कार कंपनियों का कहना है कि उनके उद्योग में कोई दिक्कत नहीं है। शायद कृषिमंत्री उन्हें बता सकें कि धान के बाद अब गेहूं की खेती का क्षेत्र भी घट गया है। मंदी बड़ी कार के उपभोक्ता से नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की क्रय-शक्ति से तय होती है। भारत में सोने की कुल खरीद का आधा ग्रामीण भारत करता है। उसमें भी कमी आई है। एक अन्य सरकारी आंकड़ा भी सरकार को चिंतित करने के लिए काफी होना चाहिए। विद्युत उत्पादन गिर रहा है, क्योंकि शहरी मध्यम वर्ग ही नहीं उद्योगों से भी मांग कम आ रही है, वे अपना उत्पादन कम करने लगे हैं। करीब 133 विद्युत इकाइयां ठप करनी पड़ी हैं। आज देश में 3.63 लाख मेगावाट बिजली की उत्पादन क्षमता के मुकाबले पिछले 7 नवंबर को मांग मात्र 1.88 लाख मेगावाट की थी। अरबों रुपए से बने पॉवर प्लांट अगर बंद हैं तो स्थिति समझना मुश्किल नहीं होगी। औद्योगिक राज्य महाराष्ट्र और गुजरात में यह मांग सबसे ज्यादा (क्रमशः 22 और 19 प्रतिशत) गिरी है। लब्बो-लुआब यह कि सरकार खुशफहमी छोड़कर देश को आसन्न आर्थिक मंदी के अभेद्य चक्रव्यूह में फंसने से पहले बाहर लाए वरना देरी महंगी पड़ेगी। सीएमआईई की रिपोर्ट ने कुछ हफ्ते पहले ही आगाह किया था कि मनरेगा में युवकों की संख्या अचानक बढ़ रही है अर्थात शहरों में नौकरियां जाने के बाद ये युवा फिर गांव की ओर पलायन कर रहे हैं। मंदी की मार सबसे ज्यादा गरीब झेलता है, क्योंकि उसकी आजीविका चली जाती है। संकेत बेहद चिंताजनक हैं।

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