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आज हताशा फैली चहूं ओर

November 07, 2019 04:19 PM

आज हताशा फैली चहूं ओर

 
आजकल, जिस तरफ देखो, विद्रोह अशांति, गुस्सा, आक्रोश फैला नजर आता है । एक तरफ प्रदूषण हदें पार कर स्वस्थ जीवन के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है तो दूसरी तरफ न्याय की पैरवी करने वाले वकील और न्याय व्यवस्था-कानून को लागू करवाने वाली पुलिस एक दूसरे के विरूध डटे हुए आम व्यक्ति का जीवन कठिन बनाने में लगे हुए है । नाकारात्मक खबरों से अखबार पटी होती है जैसे कि परिवार सहित खुदकशी, युवकों द्वारा आत्महत्या इत्यादि खबरे आम बनती जा रही है । समाजिक व आर्थिक दोनों स्तर पर एक अजब तरह की नाउम्मीदी स्थायी सी बनती जा रही है । राजनीति के बारे में तो जितना कहा जाए कि किस कदर निम्न स्तर,आदर्श मर्यादा विहीन हो रही है उतना ही कम है । बाजार व्यवस्था प्रेरित आर्थिक प्रणाली में अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है । सैन्सैक्स का निरंतर बढना, नये रिकार्ड बनाना, सोने का भाव उच्चतम स्तर पर छूना, लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था का निरंतर झुकाव नीचे की ओर रहना, चिंता का विषय है । न जी.डी.पी. बढ रही है, न उत्पादन बढ रहा है, न रोजगार बढ रहा है, देश में व्यवस्था करना मुश्किल हो रहा है, इसलिए तो कानूनी और गैरकानूनी ढंग से लोग अमेरिका व यूरोप में बसने के लिए हाथ पैर मार रहे है । हाल ही में खबर आयी थी कि मैक्सिकों ने अपने जहाज से लगभग 300 भारतीय युवाओं जोकि सपनों की दुनिया अमेरिका में प्रवेश करने के लिए उसकी सीमाओं को पार कर जा रहे थे, उन्हें वापिस भेजा । उनकी दर्दनाक तथा खौफनाक दास्तान सुन कर लगता है कि अपने देश के हालात कितने बुरे है कि इतना पैसा खर्च करके विदेश में बसना उनकों ज्यादा आकर्षक लगता है, बनिस्पत देश में उद्योग धंधा, चाहे छोटा मोटा ही सही, करने के । क्या 14 लाख रूपये से, जैसाकि उन्होंने बताया कि 20000 डालर तक उनके मां बाप ने जमीन जयदाद, घर बेचकर जो उन्होंने बाहर भेजने के लिए जुटाये थे, क्या कोई सम्मानजनक धंधा शुरू नहीं किया जा सकता था । भारत से बाहर पढने के लिए भी लाखो-करोड़ों खर्च कर विदेष में अच्छी नौकरी के लिए भी देश की युवाशक्ति बेकरार नजर आती है  । एक जमाना था, जब उम्मीद होती थी कि पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी मिल जाएगी, छोटा सा ध्ंाधा करके भी र्इ्रमानदारी और मेहनत से आगे बढा जा सकता था । पुराने बुजुर्ग कहते थे कि नीयत सच्ची और इरादा नेक हो तो कुछ भी हासिल किया जा सकता है, पर आज इस पर तो सवालीय निशान क्या, काटा क्रास ही लग गया है । चाय बेचने वाला प्रधान मंत्री बन सकता है तथा पकौड़े बेचकर कोई आर्थिक सामा्रज्य खड़ा कर सकता है, वो दिन अब लद गये हैं । आज तो जीवनयापन तथा जरूरी आवष्यकताएं पूरी करने के लिए साधन जुटाना मुश्किल हो गया है । बाजार हमारे जीवन पर हावी है, त्यौहार उत्सव न रह कर व्यापार का बहाना बन गये है, जिसमें निष्छल खुषल और उमंग का स्थान तनाव, प्रैशर ने ले लिया है और केवल बाहरी दिखावा ही महत्वपूर्ण हो गया है। मध्यम वर्ग जोकि देश व समाज की नींव होता है, सिमटता जा रहा है तथा गरीबी और अमीरी दो पाटो के बीच पिसता जा रहा है । प्रकृति की निशुल्क नियामते हवा, पानी और धूप यानि कि रोशनी उस पर भी बाजार की ताकतें काबिज हो गयी है अर्थात जो कीमत दे सकेगा, उन्हें उपलब्ध होगी । दिल्ली में किस तरह से हवा साफ करने वाल यंत्र तथा मंहगे मास्क, हाथों हाथ बिके ये इसका ताजा उदाहरण है । रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में ’’ है बहुत बरसी अमृतधार, पर नहीं अब तक कर सकी सुशीतल संसार, ’’ भोग लिया’’ आज भी लहरा रही उद्धाम, बह रही असहाय नर की भावना निश्काम, लक्ष्य क्या, उदेश्य क्या, क्या अर्थ, वह नही ज्ञात तो जीवन का श्रम व्यर्थ । वह मनुज जो ज्ञान का आगार, वह मनुज तो सृष्टि का श्रृंगार ।
 
डा0 क0कली
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