Friday, November 22, 2019
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Haryana

हरियाणा -सत्ता का खेल शुरू

October 25, 2019 04:55 PM

हरियाणा -सत्ता का खेल शुरू

 

लोकतंत्र का महापर्व चुनाव और उनका परिणाम, आने के बाद से ही सत्ता में आनेतथा सिंहासन पर काबिज होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है । वोट देने के बाद से ही असली लोकतंत्र सामने आता है । चुनावों के परिणाम अप्रत्याशित तो आये ही है पर जनता ने स्वयं सरोकारी जनवाद की तरफ अग्रसर हो, गिरे-मरे-पड़े विपक्ष को केन्द्रीय भूमिका में ला खड़ा किया है । प्रधानमंत्री जी ने तो अगले पांच वर्ष के लिए मनोहर लाल खट्टर को पुनः मुख्यमंत्री पद पर दावेदार बना ही दिया है, जबकि भाजपा के पास अभी भी बहुमत से छः सीट कम है- अर्थात निर्दलीय उम्मीदवारों में से खरीद लिये जायेंगे । लोकतां़ित्रक कार्यवाही दिखाने मात्र की भी नहीं की गई । केन्द्रीय नेतृत्व ने जो निर्णय लिया, वही सिरमाथे पर । उधर मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा ने इतनी जल्दबाजी दिखाई कि कांग्रेस हाईकमान से उन्हें सारी शक्तियां प्राप्त है और वो हरियाणा में सरकार बनाने को बेकरार दिखे तथा इस बेताबी को उन्होंने मीडिया में खुले आम प्रदर्शित किया । जे जे पी के अध्यक्ष दुष्यंत चैटाला भी अपने को किंगमेकर की भूमिका में मान, सरकार बनाने में अति उत्सुक दिखाई दिये । अर्थात जोड़-तोड़ की राजनीति तथा उम्मीदवारों की खरीद फरोखत करने में किसी को भी गुरेज नहीं है । राजनीति सत्ता का खेल है, पर सत्ता हथियाने, सत्तासीन होने को ललायित तथा येन केन प्राकरण सत्ता में बने रहने की कवायद अपने निपट निर्जज्ज रूप से देखी व समझी जा सकती है । लोकतंत्र में लोग नेताओं को सरकार बनाने के लिए, जिम्मेवारी उठाने के लिए आमंत्रित करते है न कि आपाधापी के लिए ’’पहले मैं’’ ’’पहले मैं’’ के लिए चुनते हैं। राम को आदर्श मानने वाली, राम के नाम पर वोट बटोरने वाली पार्टी, चरित्र में और नैतिक जिममेवारी के मामले में, राम के चरित्र का तनिक भी अनुकरण नहीं करती । राम और भरत, राज्य सत्ता को फुटबाल का खेल बना, एक दूसरे को राजा बना त्याग का सर्वोत्कृष्ठ उदाहरण पेश करते है । रामराज्य की संकल्पना में लोकतंत्र शामिल है, पर हमारे लोकतंत्र में रामराज्य तो शामिल है ही नहीं, पर लोकतंात्रिक परिपाटियां तथा जनतांत्रिक परम्परायें भी सिरे से खारिज हो रही है । हम ऐसे समय में जी रहे है जहां भ्रष्टाचार सत्ता का मोह, धन व सत्ता का दुरूपयोग सरेआम धड़ल्लेसे हो रहा है , आदर्श, मर्यादा व शालीनता सार्वजनिक जीवने से गायब हो रही है, ऐसे में आमजन की चुप्पी ही उसकी विवशता है । अंत में, प्रसिद्ध कवि की ये पंक्तियां -

’’ तुजर्बे ने एक बात सिखाई है,

इक नया मर्ज, पुराने दर्द की दवाई है 

 

      डा.क.कली 

 
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