Thursday, December 12, 2019
Follow us on
National

अपने अलग अलग रावण जलाने का चलन

October 09, 2019 05:35 PM


 
उत्सव व त्योहार सदैव सामुहिकता का बोध कराते हैं, सामुदायिक खुशी की अभिव्यक्ति त्योहार का रूप ले लेती है। दशहरा, विजयादशमी पूरे भारत में अलग अलग राज्यों में विभिन्न नामों से मनाया जाता है। लेकिन हैरान करने वाली बात है अब यह सांस्कृतिक पर्व, जोकि कभी पूरे शहर में मेलजोल को बढ़ाने तथा मेले का रूप ले लेता था, अब केवल गली मोहल्ले तक सिमटता जा रहा है। एक रावण, मेरे घर के आगे पार्क में जलाया जा रहा था तो दूसरा पिछली गली के बच्चे अपने घर के सामने अलग रावण बना उसे फूंक रहे थे। सार्वजनिक स्थल पर भी रावण के बड़े बड़े पुतले बनाये व जलाये जा रहे थे पर जैसे और त्योहार हम अपने घर परिवार में मनाते हैं, वैसे इस सामाजिक त्योहार को भी निजी व वैयक्तिक सीमाओं में बांधा जा रहा है। एक तरफ वैश्वीकरण व राष्टीयता की भावनायें व प्रवृतियां पनप रही हैं, वहीं दूसरी ओर समाज व लोग सांस्कृतिक रूप से संकुचित व सीमित सोच वाले बन रहे हैं सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर, अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक दशहरा केवल दस सिरों वाले रावण के पुतले जलाने का रीति रिवाज बन रहा है। त्योहार सांस्कृतिक मूल्यों के निर्वाह तथा वहन का माध्यम होते हैं, एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को जीवन मूल्य हस्तांतरित करने के साधन बनते हैं, पर आज सिवाय छुटी मनाने, खाने-पीने, मौज मस्ती का पर्याय बन चुके हैं। महाज्ञानी, चार वेदों का ज्ञाता महाप्रतापी राजा, प्रकांड पंडित रावण जोकि महाशिवभक्त था, जिसने अति सुन्दर शिव तांडव स्रोत की रचना की थी, जो अजेय, महापराक्रमी था, उस पर साधनहीन बनवासी राम ने कैसे विजय प्राप्त की, कैसे अंहकार व दुराचरण रावण के पतन व उसकी पराजय का कारण बने कि ‘‘इक लख पूत, सवा लख नाती, ते रावण घर दिया न बाती’’। कागज व पटाखो से बने रावण के पुतले जलाने से, वो भी अपने हर गली मोहल्ले में तो वे केवल प्रदूषण बढ़ाने का काम कर रहे हैं। सांस्कृतिक, नैतिक व सामाजिक मूल्यों, आदर्शों को जीवन में स्थापित करने व बुराइयों और दुर्गुणों को तिलांजलि देने के बदले अपने अपने रावण के पुतलों को जलाकर क्या सिद्ध कर रहे हैं। संगठन में बल होता है, समाज में बुराइयों व कुरीतियों का सार्वजनिक व संगठित विरोध, अपने आप ही उन बुराइयों को खत्म कर देता है, जो व्यक्ति के लिये गलत व बुरा है, वो परिवार व समाज के लिये भी घातक होता है, शायद इसलिये सालोसाल परम्परायें जीवित रहती हैं। पहले रामलीला गली नुक्कड़ पर भी होती थी, पर अब रामलीलाये ंतो सीमित हो टीवी सीरियलस में ज्यादा देखी जा रही है, पर रावण के पुतले गली गली में जलायें जा रहे हैं। शायद राम जिसका प्रतीक थे और रावण जिसका प्रतिनिधित्व करता है, उसमें ही घालमेल हो गया है। गांधी के ‘‘रघुपति राघव राजा राम’’ या तुलसी के ‘‘सिय राम में सब जग जानी’’ वाले राम केवल अयोध्या के रामजन्म भूमि विवाद में सीमित हो गये हैं तो कोई बड़ी बात नहीं कि हर कोई रावण के पुतलों को जला दशहरा मनाने में अपनी इतिश्री समझे तथा निज जीवन से बुराइयों को उखाड़ फैंकने व अच्छाई ग्रहण करने में  तटस्थ रहे।
       डा. क.कली
 
Have something to say? Post your comment
 
 
More National News
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने आज सुप्रीम कोर्ट में CitizenshipAmendmentBill2019 के खिलाफ एक रिट याचिका दायर की सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल IUML ने अपनी याचिका में SC से # नागरिकता कानून संशोधन 2017 को अवैध और शून्य घोषित करने का अनुरोध किया Railways to run 150 pvt trains on busiest routes
Adaptation of Laws (Amendment) Order, 2019
हैदराबाद एनकाउंटर मामले में आज भी सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई नागरिकता बिल पर बवाल के बीच आज अमित शाह से मिलने दिल्ली आएंगे मेघालय के मुख्यमंत्री नागरिकता बिल को चुनौती देने के लिए SC में आज दाखिल होंगी कई याचिकाएं प्रधानमंत्री मोदी ने शरद पवार को दी जन्मदिन की बधाई नागरिकता संशोधन बिल पर असम में हिंसक प्रदर्शन, दो रेलवे स्टेशन जलाए गए वोटिंग के बाद राज्यसभा में नागरिकता संशोधन बिल पास