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कुछ सीखें - पटना शहर के जलभराव से

October 03, 2019 05:19 PM

कुछ सीखें - पटना शहर के जलभराव से ।

पटना शहर का बरसात के पानी से डूब जाना, चर्चा का विषय बना हुआ है । बिहार में बाढ़-बारिश से बिगड़े हालात और अव्यवस्था पर मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के ब्यान ने कि अमेरिका में भी ऐसा हो सकता है, मुबई में ऐसा हो सकता है, तो पटना में भी हो सकता है । मुहल्लों में पानी भर गया तो क्या यही समस्या है । उनके इस बेतुके ब्यान से राजनीतिक चर्चा गर्म हो गयी है कि कलाइमैट चेंज के समक्ष कोई कुछ नहीं कर सकता । राजनेता व सत्तासीन अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए किस तरह से पतली गली से निकलते हैं तथा अपनी नाकामियों को कैसे प्राकृतिक आपदाओं के मत्थे मढ़ते हैं, यह इसका ताजा उदाहरण है । गांवों के गांव डूब जाते हैं, खड़ी फसलें बाढ के पानी से बह जाती हैं, पर जब यही पानी हमारे बड़े बड़े शहरों जैसे कि मद्रास और मुंबई में भी तबाही का कारण बनता है, तो जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बहस शुरू हो जाती है । हालांकि जो कुछ मद्रास, मुबई या अब पटना में जलभराव से आपदा आई है, वह शहरी नियोजन की नाकामी का उदाहरण है । सुशासन बाबू नीतिश कुमार लोगों की पीड़ा तथा परेशानी को समझने की बजाय उनका यह कहना कि अमेरिका में भी होता है, प्राकृतिक आपदा व कलाइमेट चेंजका यह नतीजा है, पूरी दुनिया इस समस्या से जूझ रही है, बेतुका जवाब तथा गैरजिम्मेदाराना रवैया है । यह कटु सत्य है कि प्राकृतिक आपदा के सामने सब बराबर होते हैं, चाहे वो अति-विशिष्ट व्यक्ति यानि वी.वी.आई.पी हो या आम नागरिक, जैसे कि पटना के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी जलभराव की वजह से अपने घर में तीन दिन तक बंधे रहे, साथ ही दो पूर्व मुख्यमंत्री-सत्येंद्र नारायण सिंह व जतिन राम मांझी के घरों में भी पानी घुस आया । प्राकृतिक शक्तियां जब विपरीत दिशा लेती हैं, विरोधी हो जाती हैं तो वो सबकों बराबर कर देती हैं, चाहे अमीर हो या गरीब, रसूखधार हो या आमजन सब उसकी चपेट में आ जाते हैं । कुमार विश्वास की प्रसिद्ध पंक्तिया याद आती हैं ’’ये दीवाना आवारा बादल क्या जाने किसका धर भिगोना है और किस का नहीं’’ दरअसल ये हालात शहरी नियोजन में कुव्यवस्था तथा नगर निगमों के कुप्रबंधन की वजह से बने हैं। महानगरों में जब ऐसी स्थिति पैदा होती है तो आपदा प्रबन्धन विभाग सक्रिय हो जाते हैं, पर पहले से ही नियोजन तथा उस घटना से सबक लेकर पहले से जो कदम उठाये जाने चाहिए । प्रो-एक्टिव एप्रोच नहीं ली जाती । अपितु मामले को दूसरों में धकेलने का प्रयास किया जाता है जैसे कि बिहार के मुख्यमंत्री ने किया, शहरी नियोजन व पानी प्रबंधन पर अपनी नाकामी को ’’अमेरिका व मुबई में भी हो सकता है’’ तो पटना में क्यों नहीं हो सकता, आखिरकार पटना भी देश के ’’स्मार्ट सिटी’’ सूचना में आगे की श्रेणी में शामिल है । ऐसी रिपोर्ट मिली है कि यह जलभराव न तो बादल फटने की वजह से हुआ है न ही बाढ़ के पानी से, शहर की संकरी गलियां, नालियों की साफ सफाई न होने तथा निकासी के नालों में कचरा व पलास्टिक पदार्थों से भर जाने तथा नगर निगम के मुख्य कार्यों - साफ सफाई की कमी व अनदेखी का भी परिणाम है । बढती जनसंख्या तथा बढते निर्माण कार्य जोकि नदियों के फैलाव क्षेत्र में नियमों का उल्लंघन कर बना दिए जाते है, उनकी वजह से भी पानी की निकासी न होने से, पानी घरों में घुस जाता है तथा बाढ जैसे नुकसान सामने आ जाते है । बिहार के पटना शहर में जो हुआ या जैसे चेन्नई व मुबंई जलमग्न हुए, इन घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है । एक तरफ पानी की कमी, कहने वाले ये भी कहते है कि अगला विश्व युद्ध पानी के उपर होगा, दूसरी तरफ पानी का यह रौद्र रूप जैसेकि पटना के कई परिवार जो पानी में फंसे थे, उनका दर्द झलका दिखा कि उनके पास पैसे हैं, पर न खाने पीने का सामान, न बिजली न कहीं बाहर जाने का रास्ता, क्या ऐसा भी हो सकता है, ऐसा सोचा भी नहीं था । जल जमाव के पीड़ितों की शाह बिहार प्रशासन ले रहा है, मुख्यमंत्री ने प्रभावित लोगों की हरसंभव सहायता करने का आश्वशन दिया है, फिल्मी सितारे सहायता के लि आगे आये हैं, इंटरनेट व फेसबुक सोशल मीडिया की सहायता से भी इस आपदा से बचाव के तथा निपटने के कदम उठायेजा रहे हैं।  ऐसे जलप्रलयी हालातों से निपटना तो है ही, उनसे सबक भी लेने की जरूरत है क्योंकि कब कोई हमारा महानगर मुंबई, चैन्नई या पटना बन जाए कि पानी विभीषिका बन जाए । सन् 1917 के बाद, सितम्बर महीना सबसे ज्यादा बारिश वाला महीना 2019 में बीता, मानसून देरी से वापिस लौट रहा है, वैज्ञानिक बताते है कि जलवायु परिवर्तन आज की सच्चाई है, जिसे नकारा नहीं जा सकता । अतिवृष्टि और अनावृष्टि, अतिसर्दी, अति गर्मी जैसे प्राकृतिक घटनाएं बार बार होंगी, मनुष्य को चेतने की जरूरत है विकास के तरीकों पर गौर करने तथा प्रकृति से खिलवाड़ करने से बाज आना होगा । अंत में मौसम बदलते हैं, मौसम का बदलना स्वाभाविक है, पर अब तो मौसम क्या बदलते हैं, मुसीबत का सबब बनते हैं, कहर ढह पड़ते  हैं ।

डा. क.कली

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