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स्वच्छताग्रह से सत्याग्रह की ओर चलें

October 01, 2019 08:58 PM



गांधी जयन्ती, विशेषकर उनकी 150वीं वर्षगांठ न केवल भारत में अपितु वैशिवक स्तर पर मनायी जा रही है । गांधी जी अपने क्रांतिकारी विचारों से जीवन के विविध आयामों को नया दृष्टिकोण प्रदान करते है, इसलिए आज भी उनकी प्रासंगिकता बनी हुई है । ‘‘स्वच्छ भारत’’ का अभियान भी उनको स्मरण करने तथा उनके द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलने का एक प्रयास है । गांधी जी के जीवन में सत्यता, पवित्रता, शुुचिता तथा स्वच्छता सब एक पैमाने के विभिन्न पहलू थे । उनका जीवन में सत्य के प्रति आग्रह जितना प्रचंड था उतना ही स्वच्छता के प्रति जुनून था। साधनों की शुुचिता का प्रश्न हो या ब्रह्यचर्य यानि विचारों की पवित्रता हो, सब पर उन्होंने अपना विशेष दृष्टिकोण रखा तथा उनके साथ उन्होंने अपने जीवन में प्रयोग किये। आज व्यक्तिगत जीवन तथा सार्वजनिक जीवन दोनों में ही स्वच्छता और सत्यता दोनों की दरकार हैं । स्वच्छता तो शुरूआती कदम है जिसकी परिणति सत्यता के रूप में होती है। गांधी जी के लिए यदि  Truth is God  है तो Cleanliness is next to Godliness भी है । स्वच्छता जहां बाहरी वातावरण से संबंधित है वहीं सत्यता अन्तर्मनख आंतरिक स्थिति से संबंधित है । गरीबी और असंख्य वर्षों की गुलामी ने भारतीयों के जीवन में से पहले बाहरी स्वच्छता नदारद हुई उसके बाद जीवन से सत्यता का भी लोप हो गया । लेकिन जब विश्व इतिहास में गांधी उतरते हैं तो वे अपने सत्य के प्रयोगों से न केवल भारतीयों के लिए प्ररेणास्त्रोत बने अपितु कई विश्वस्तरीय नेता जैसे नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग के भी रहनुमा बने  उनकी अहिंसा की धारणा इतनी विस्तृत थी कि उन्हें उपभोक्तावाद प्रवृत्ति भी गरीब के नजरिए से हिंसक प्रतीत होती थी, यही कारण है कि उन्होंने स्वैच्छितक गरीबी’’ को जीवन में अंगीकार किया और ‘‘नंगे फकीर’’ बन गये। न्यूनतम आवश्यकताओं के पक्षधर गांधी जी सच्चे पर्यावरण रक्षक थे वे कहते थे कि इस धरा पर सब की आवश्य कताओं को पूरा करने के लिए साधन तो है पर लालच तो एक का भी पूरा नहीं हो सकता । लेकिन आज ‘‘प्रयोग करो व फेंको’’  की संस्कृति पूरे ब्राह्मंड के लिए खतरा बन चुकी है कहीं जलवायु खतरे के रूप में तो कहीं साधनों का अंधाधुंघ दोहन से उत्पन्न दुर्लभता के रूप में।
उनकी 150वीं जयंती पर अनेकों आयोजन, कार्यशालाएं न केवल देश में, अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसको मनाया जा रहा है, उन्हें स्मरण किया जा रहा है, उन पर लेख लिखे जा रहे हैं,  उनको फिर से समझने तथा उनका मूल्यांकन करने के प्रयास जारी हैं। गांधी विचारधारा में राजनीति, समाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व साहित्यिक विचार सब निहित है, पर एक साधारण मानव के लिए भी उनकी जीवन यात्रा कि वे कैसे साधारण से असाधारण बने, महात्मा बने, अवलोकनीय तथा अनुकरणीय है। स्वच्छता का आग्रह यदि बाहरी साफ-सफाई पर बले देता है, वहीं सत्यता का आग्रह आत्मबल के संवर्धन की बात करता हैं। बाहरी स्वच्छता शारीरिक श्रम की मांग करती है तो वहीं आंतरिक पवित्रता, मानसिक बल-मनोबल के बढ़ने से ही संभव है। गांधी के तौर तरीके पिछड़े हो सकते है, पर उनके विचारों की आभा आज भी चमक रही है क्योंकि सत्य शाशवत है, सत्य की चमक कभी धुमिल नहीं पड़ सकती। आओं, गांधी से सीखे कैसे जीवन में स्वच्छताग्रह से सत्याग्रह की तरफ बढ़ा जाए। न केवल निजी स्तर पर अपितु समाजिक स्तर पर, राज्य स्तर पर , राष्ट्र के स्तर पर जीवन में स्वच्छता तथा सत्यता का लायें, क्योंकि स्वच्छता और सत्यता एक ही पैमाने के दो विभिन्न छोर है, सिक्के के दो पहलू है । स्वच्छ भारत ‘‘अभियान के साथ साथ’’ सत्यमेव जयते’’ को भी सार्वजनिक जीवन में शामिल करें तथा ’’असतो मा सद गमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर मा अमृत गमय’’ का उदभोदन करें।
डा. क.कली

 
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