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Haryana

प्याज की बढ़ती कीमतें - जरा प्याज की खेती करने वालो के बारे में भी सोचिए ।

September 26, 2019 04:30 PM

 

प्याज की कीमतों का बढ़ना, किसी आम कृषि उत्पाद की कीमत बढ़ने की तरह नहीं ली जाती. क्योंकि राजनैतिक दृष्टि से यह मुद्दा संवेदनशील बन चुका है, क्योंकि इसकी बढ़ती कीमतें सरकारों को गिरा सकने की सामथ्र्य रखती है । कहते तो ये है कि पावर यानि सत्ता भ्रष्ट करती है, पर हकीकत में सत्ता नहीं, इसके खोने का डर नेताओं व सत्तासीनो को भ्रष्ट करता है । सरकार ने बढ़ती कीमतें चुनावी मुददा न बने, इसे ध्यान में रखते हुए न केवल चीन से प्याज आयात करने का निर्णय लिया है, अपितु प्याज का अधिकतम निर्यात मूल्य भी निश्चित कर दिया है, ताकि नवम्बर में जब देसी प्याज की फसल आयेगी तो किसान उसे निर्यात करने की बजाय देशी बाजार में सस्ती कीमत पर ही बेचे । चुनाव कुछ राज्यों में जैसे कि हरियाणा, महाराष्ट तथा झारखंड इसी साल, अगले महीने होने है, सरकार प्याज की बढ़ती कीमतों को उपभोक्ता(वोटर्स) को देख रही है । कृषक को केवल उत्पादक के तौर पर देखा जाता है, यही कारण है कि खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है और कृषक की दशा दिन प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है । फसल ज्यादा हो जाए तो उचित कीमतें न प्राप्त होने के कारण, उसे अपनी उपज सड़कों पर मुफत गिराकर सरकारों का ध्यान खंीचना पड़ता है, उधर जब कम फसल से कम पूर्ति की दशा में कीमतें बढ़ने की स्थिति में, सरकार का निर्यातों पर प्रतिबंध तथा आयात को बढावा देना, उसके लिए भारी पड़ता है। कारण स्पष्ट है, कृषि पदार्थ नाशवान होते है उनकी कीमतें पूर्ति से निर्धारित होती है, मांग अपेक्षाकृत बेलोचदार होती है, अतः उनका बढना सीधे सीधे मुद्रास्फीति के बढने से जोड़ दिया जाता है । आम व्यक्ति के लिए खाद्य पदार्थों की कीमतें बड़ा मायना रखती है, थोक व्यापारी व खुदरा व्यापारी अपनी लागत में निश्चित प्रतिशत लाभ के तौर पर जोड़ कर उपभोक्ता को बेचते है, किसान जोकि उत्पादक है, उसको लागत भी मिल जाए यह गनीमत है, खेती करना आज जोखिम का सौदा बनता जा रहा है, खेती, जिसमें कि रोजगार की दृष्टि से, सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से लोग लगे हुए है, फिर भी सरकार की आर्थिक नीतियां विशेषकर कीमत निर्धारण संबंधी, किसाने के हितों के विरूध है । मीडिया ने भी प्याज की कीमत आने वाले समय में 100 रूपये प्रति किलों तक जाने की आशंका को खूब तड़का लगा कर प्रस्तुत किया, सरकारे हरकत में आयी तथा तुरन्त आयात का निर्णय और निर्यात की अधिकतम कीमत निश्चित कर दी । लोग कहने लगे कि लाल सुनहरी मीठा सेब की कीमत तथा कड़वे प्याज की कीमत, बाजार में बराबर चल रही है, इसलिए मीठा सेब खाओं, गरीब की हैसियत से तो दोनों ही बाहर है, हां मध्यमवर्ग की झोली में सेब आ पड़ा है, पर सेब की कम कीमत पर कोई आंसू नहीं बहायेगा, पर कड़वे प्याज में जरूर उभोक्ता की आंखों में आंसू लाने की स्वाभाविक शक्ति है । पर बेचारा किसान क्या करें, पहले तो मौसम की मार ने फसल को ही चैपट कर दिया, अब सरकार की नीतियों में खामियों की वजह से उसे बड़ी हुई कीमतें भी नहीं मिलेगी । ऐसा नहीं है कि सरकारें किसान या खेती का भला नहीं चाहती, पर हमारी आर्थिक नीतियों सरंचना ही ऐसी है कि किसानों को बढी हुई कीमतों से कभी फायदा नहीं होता । यदि खाद्य पदार्थों की कीमतें बढती है तो उपभोक्ता कीमत सूचकांक बढ़ जाता है, क्योंकि इसमें 50 प्रतिशत हिस्सा खाद्य पदार्थों का होता है अर्थात सरकार इसकों मंहगाई बढने से सीधा जोडती है, जबकि मैन्यूफैक्चर्ड गुडस की कीमते बढती है, तो उत्पादक का लाभ बढता है, इसे आर्थिक दृष्टि से अच्छा माना जाता है क्योंकि लाभ बढने से निवेश बढ़ेगा, निवेश से रोजगार, रोजगार से आय, आये से मांग बढ़ेगी, इस तरह आर्थिक विकास का चक्र तेजी पकड़ लेता है । लोग खेती करना छोड रहे है, कृषि घाटे का व जोखिम का व्यवसाय बनती जा रही है, कभी उत्तम खेती, मध्यम व्यापार माना जाता था, पर आज यह सच नहीं है । गरीब व सीमान्त किसानों को पेंशन देकर तथा अन्य सहायता देकर, ज्यादा देर तक लोगों को कृषि से बांधा नहीं जा सकेगा, सरकार को अपनी कृषि संबंधी विपणन तथा व्यापार (आयात-निर्यात) संबंधी नीतियों के पुनार्वालोकन की आवष्यकता है । अन्त में किसान की दुर्दशा पर ’’ मैं भला कैसे बताउं, बात जमाने को, कितनी शिद्धत से लड़ा हूं, मैं जान बचाने को, डाल से टूटे पत्ते ने हवा से पूछा, क्या तुझे मैं ही मिला हूं, जोर अजमाने को ।

डा. क.कली

 
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