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बढ़ती प्याज की कीमतें व झूमता नई ऊंचाइयां छूता शेयर बाजार ।

September 24, 2019 03:45 PM

बढ़ती प्याज की कीमतें व झूमता नई ऊंचाइयां छूता शेयर बाजार ।

 
शेयर बाजार पूरे धूम धड़ाम से नयी ऊंचाइयां छू रहा है, उत्सवों के आने से पहले ही बाजार उमंग उत्साह से आगे कुलांचे भर रहा है तथा विशेषज्ञ यह मान रहे है कि ये तेजी बाजार में जारी रहेगी । शेयर बाजार की खुशहाली से कुछ लोगों के वारे न्यारे हो रहे है, दो ही दिन शुक्र्रवार और सोमवार को ही बाजार खुले रहे तो उनमें  सेंसैक्स में 3000 प्वांइटस और निफ्टी में 895 प्वाईटस की तेजी आयी है । वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा जो मिनी बजट पेश किया गया आखिरकार वो काम कर गया । ऐसा माना जा रहा है कि ये जो कारपोरेट कर दरों में संरचनात्मक सुधार किए गये है, इससे उद्योगपतियों की जेब में ज्यादा पैसा आयेगा, वे लाभ को निवेश में बदलेगे, निवेश से उत्पादन बढेगा, रोजगार बढ़ेगा, आय बढ़ेगी, लोगों की क्रयशक्ति बढेगी, मांग बढेगी, फलस्वरूप और निवेश तथा उत्पादन बढ़ेगा । अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने के बाद दु्रतगति से आगे की ओर बढ़ेगी । लेकिन अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्था में भी, जहां पूंजी बाजार तथा मुद्रा बाजार काफी विकसित है, उनके यहां पर पाल क्रुगमैन नाबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री भी ये मानते है कि स्टाक मार्केट अर्थव्यवस्था नहीं है अर्थात सैंसेक्स का बढना आर्थिक विकास के पर्याय नहीं है । भारत जैसे देश में जहां वित्त अर्थव्यवस्था (थ्पदंदबपंस म्बवदवउल ंदक त्मंस म्बवदवउल) का बहुत छोटा सा हिस्सा है, वहां तो बाजार की हलचल आर्थिक विकास की गति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती । देश में आज सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है। अभी हरियाणा राज्य में क्र्लक की भर्ती अभियान लगभग 5000 से भी कम पदो ंके लिए जो लिखित परीक्षा आयोजित की गयी, उसमें 15 लाख से भी ज्यादा अभियार्थियों ने अपना भाग्य आजमाया । इन सब युवाओं के लिए शेयरबाजार में यह भारी उछाल क्या अर्थ रखता है । उनके लिए तो आलू प्याज की बढती घटती कीमतें ज्यादा मायने रखती है । लेकिन कितना विरोधाभास है, जिसे कृषि विशेषज्ञ देवेन्द्र शर्मा ने यूं व्यक्त किया है ’’ आलू - प्याज की कीमतें बढ़ती है तो वे मुद्रा स्फीति कहलाती है अर्थात कृषि पदार्थों की कीमतें बढती हैं तो विकास का दुष्चक्र चलता है शेयरों की कीमतें बढ़ती है तो विकास का शुभचक्र अर्थात लाभ बढेगें, निवेश-रोजगार बढेगा, उत्पादन तथा आय बढेगी, मांग बढेगी, आर्थिक प्रगति का चक्र उपर की तरफ चलेगा तथा अर्थव्यवस्था सुधर जायेगी । लेकिन इतना बड़ा चक्र फिरने में समय तो लगता है । सरकार क्यों नहीं इस समय अपनी सारी नीतियों चाहे वह मौद्रिक नीतियां हैं, वित्तीय कर नीतियां है, औद्योगिक नीति है या शैक्षणिक नीतियां, सबका केंद्रीय बिंदू - रोजगार सृजन होना चाहिए । सूटबूट की सरकार अर्थात कारपोरेट जगत की हिमायती सरकार हो या माई-बाप वाली सरकार देश में व्याप्त बेरोजगारी से बेखबर नहीं हो सकती। ’’हाउडी-मोदी कार्यक्रम में चाहे मोदी जी का कितना भी भव्य स्वागत हो खुशी की बात है, लेकिन पहले हाउडी देश के बेहताशा लोगों से पूछा जाना चाहिए । एक तरफ प्याज की बढती कीमत भी उसी आम व्यक्ति को रूलायेगी तथा तेल की कीमतें बढने से भी यदि वित्तीय घाटा बढता है तो कल्याणकारी योजनाओं पर कट भी उसी आम व्यक्ति को प्रभावित करेगा । करों में कटौती से भारत निवेश के लिए दूसरे देशों की अपेक्षा अधिक आकर्षक बनेगा । शायद यही कारण है कि उद्योगों पर करों में भारी कटौती को प्रधानमंत्री की हयुस्टन में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ मुलाकात के समय को साथ जोड़ा गया हे । मोदी वहां भारतीय समुदाय के लोगों के साथ साथ वहां अमेरिकी सी ई ओ से भी मिल रहे है तथा आर्थिक अनुबंधों में भी पहल करेंगे ऐसा माना जा रहा है । देश की घरेलू अर्थव्यवस्था, उसकी आय, मांग बचत को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास क्यों नहीं होने चाहिए । निर्यात के बढ़ने से तो कुल पूरी अर्थव्यवस्था का उ़द्धार संभव नहीं है । विकास, जब तक  स्वःस्फूर्त नहीं होगा, नीतियां रोजगार उन्मुखी नहीं होगी, आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबंन उदेश्य नहीं होगा, तो देश के लिए अच्छे दिनों का सपना साकार नहीं हो सकता । अंत में, जुनून का दौर है, किस किस को जाएं समझाने, इधर भी अक्ल के दुश्मन हैं, उधर भी दीवाने ।
 
डा. क.कलि
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