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व्यक्त करो अभिव्यक्त करो

September 16, 2019 02:14 PM

रोको न स्वयं को, टोको न स्वयं को,न अवरोध करो, न प्रतिशोध करो,बहती प्रखर चिंतन की धारा को, शब्दो से सशक्त करो,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।जीवन के प्रति सजग सजीव बनो,स्वयं तथा आसपास के लिये संवदेनशील बनो,जानो स्वयं को, पहचानो स्वयं को,मन की कंदरा में छिपे विचारों भावों को प्रकट करो,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।रीता न जाये ये जीवन बीता न जाये यूं जीवन,अंगीकार करो जो है, इसे स्वीकार करो,इसी समय करो, इसी वक्त करो,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।दूसरों के सुख-दुख के भागीदार बनो,क्षमा सहनशीलता के किरदार गुणों,ईर्ष्या द्वेष नकारात्मक भावों में स्वयं को उन्मुक्त करो,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।न सिमटो स्वयं तक न रूको किनारो पर न पलटो आदर्शों को, न झुको सहारों पर अपनी राहें स्वयं तलाशों, न मिले तो नव-निर्माण करो,दूसरों के लिये मार्ग प्रशस्त करो,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।प्रकृति करती इंतजार तुम्हारा है, उठो स्वयं उठाओ औरों को,ये अखिल विश्व तुम्हारा है, जी लो हर पल को,भर लो मन को, छिपी प्रतिमा का उत्कर्ष करो,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।कहीं जुड़ते हो तो जुड़ो मन से,कर्म करो तो पूरी शिद्वत से,आबद्ध करो स्वयं को, प्रतिबद्ध करो स्वयं को,लोहा लो, उजागर हो शक्तियों को प्रत्यक्ष करो,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।अंतमर्न के पर्दे हटाओ, प्रकृति की परतें उठाओ,ऊंचा आसमां तुम्हारे पंखों को ललकारता है,स्वतंत्र उन्मुक्त भयमुक्त लेखन तुम्हें पुकारता है,भाषा की सौम्यता लिये गरिमामय विचारों को,व्यक्त करो, अभिव्यक्त करो।


                                                          डा0 क0कली

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