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अर्थव्यवस्था नहीं है स्टाक मार्केट

August 24, 2019 12:35 PM

अमेरिका जैसी विकसित तथा आधुनिक अर्थव्यवस्था के बारे में पाल क्रगुमैन, जोकि अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता भी हैं, बार-बार कहते रहे हैं कि ‘‘स्टाक मार्केट अर्थव्यवस्था नहीं है’’, लेकिन राजनेता तथा बड़े व्यवसायी स्टाक मार्केट की हलचलों से ही आर्थिक समस्याओं का निदान करना चाहते हैं। परसों जब बाजार 6 माह के निचले स्तर पर पहुंचा तथा रुपया प्रति डालर के बदले 72 रुपये के स्तर पर पहुंचा तो सरकार को अर्थव्यवस्था में मंदी तथा सुस्ती का आभास हुआ तो कल ही वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये तथा आर्थिक गतिविधियों को धार देने के लिये आर्थिक पैकेज की घोषणा की, जिसमें कई क्षेत्रों को आर्थिक मंदी से उबारने के लिये कारगर उपायों की घोषणा की गई है। बिजनैस स्टैंडर्ड अखबार ने इसे मिनी बजट बताया। आर्थिक बदहाली से निपटने के लिये सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये 70,000 करोड़ रुपये पूंजी की व्यवस्था की गई है ताकि वे उद्योगों को सस्ती ऋणव्यवस्था प्रदान कर सके। जी एस टी को आसान बनाने, संकट से जूझ रहे वाहन उद्योग को राहत देने और सभी पात्र ऐंजल कम्पनियों को टैक्स से छूट देने तथा दीर्घकालीन कैपिटल गेन तथा अल्पकालीन पूंजीगत लाभ पर बड़ा हुआ अधिभार वापिस लेने की घोषणा की है। बढ़ते टैक्स आतंक को खत्म करने तथा पूंजी बाजार में नकदी तथा अतिरिक्त उधारी की व्यवस्था करने की घोषनायें की गई है। सरकार का कहना है कि व्यवसायिक जगत की परेशानी कम करने तथा आर्थिक पारदर्शिता लाने के लिये सरकार प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री ने जब लालकिले से अपने भाषण में कहा कि उनकी सरकार धन तथा वित को पैदा करने वाली संस्थाओं तथा व्यक्तियों का सम्मान करती हैं। कुछ इसी तर्ज पर सरकार ने उद्योगपतियों तथा व्यवसायिक जगत की समस्याओं को हल करने तथा आर्थिक गतिविधियों को तेज करने के उद्देश्य से ये ठोस कदम उठाये गये हैं। यहां यह बताना आवश्यक होगा कि सरकार इस तथ्य को नकारती रही है कि अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ जा रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत का स्थान पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था से लुढ़क कर सातवें स्थान पर आ गया है। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर शक्तिकांत ने कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर में जा रही है। आज बेरोजगारी देश में पिछले पांच दशकों के रिकार्ड निचले स्तर पर है। हालांकि वित्तमंत्री ने आर्थिक मंदी तथा आर्थिक समस्याओं के लिये पिछली यूपीए सरकार तथा वैश्विक वित्तीय मंदी को जिम्मेदार ठहराया पर यह सर्वविदित तथ्य है कि नोटबंदी तथा जिस ढंग से जीएसटी लागू किया गया, उसकी वजह से भारतीय कारोबारी का मनोबल टूटा है तथा अर्थव्यवस्था लुढ़कती गई है। सरकार ने यह जो कदम उठाये हैं, आने वाला समय बतायेगा कि ये उपाय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में कितने कारगर सिद्ध होते हैं। भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था ही इतनी बड़ी है कि यदि इसे दुरूस्त रखा जाये तो कोई कारण नहीं है कि अंर्तराष्टीय हलचल इसे ज्यादा प्रभावित कर सके। 2008 की वैश्विक मंदी से जब बड़े-बड़े देश मंदी को निपटने में नाकामयाब रहे, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट से बची रही। पर अब ऐसा होता प्रतीत नहीं होता। बिजनैस स्टैंडर्ड में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 195 बड़ी फर्मों की कर्ज बाजार पूंजी से ज्यादा है अर्थात वे दिवालिया होने के खतरे के स्तर पर हैं। वित्तीय दबाव का सामना कर रहे ये उद्योग आशा करते हैं कि इस मिनी बजट से लाभान्वित हो सकेंगे तथा अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सकेगी। अंत में चाहे सरकार को ‘‘सूट बूट की सरकार’’ कहो या ‘‘माई बाप की सरकार’’ अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने की जिम्मेवारी तो सरकार की बनती है।

डा0 क. कली

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