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Editorial

NBT EDIT-कांग्रेस की मजबूरी फिर सोनिया के हाथ कमान

August 13, 2019 06:51 AM

COURTESY NBT AUG 13

कांग्रेस की मजबूरी


फिर सोनिया के हाथ कमान
सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष चुने जाने से कांग्रेस में करीब दो महीने से चला आ रहा गतिरोध फिलहाल समाप्त हो गया है। लेकिन पार्टी के सामने मौजूद सारी चुनौतियां आज भी ज्यों की त्यों हैं और उनका समाधान खोजने के लिए ज्यादा वक्त उसके पास नहीं है। पार्टी की असल मुश्किल यह है कि उसके नेता कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। नया अध्यक्ष चुनने की राह पर बढ़ने के बजाय उन्होंने एक बार फिर नेहरू-गांधी परिवार की शरण में जाना बेहतर समझा। सोनिया पहले भी संकट की घड़ी में कांग्रेस को उबार चुकी हैं। 1998 से 2017 तक उन्होंने पार्टी का नेतृत्व किया। वर्ष 2004 में चुनाव प्रचार का जिम्मा संभाला और एक नहीं, दो आम चुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाई। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। एक तो उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, दूसरे कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा छिन्न-भिन्न हो चुका है। पार्टी अपनी जमीनी पकड़ खो चुकी है और दो आम चुनावों के अलावा ज्यादातर राज्यों में भी लगातार हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल रसातल में जा चुका है। सबसे बड़ी बात यह कि देश के बदले सामाजिक-राजनीतिक माहौल में पार्टी का जनता से सीधा संवाद नहीं रह गया है। सतह के नीचे की हरकत यह है कि लोग अब किसी घराने की चमक-दमक से प्रभावित नहीं होते। वे सिर्फ यह देखते हैं किसके साथ उनका मिजाज मिलता है और अपने दुख-सुख का साझा वे उससे कर सकते हैं या नहीं। यानी पार्टियों का सिर्फ चुनाव में नजर आना काफी नहीं है। हर दिन की सक्रियता उनके लिए जरूरी हो गई है। इसके लिए जैसा संगठन उनके पास होना चाहिए, वह कांग्रेस के पास नहीं है। उसके पास ऐसे नेताओं की भारी किल्लत है जिनका आम लोगों में उठना-बैठना हो और जो अपने दम पर पार्टी के लिए वोट जुटा सकें। पार्टी में हर कोई हर बात में आलाकमान का मुंह ताकता है। राहुल गांधी की तमाम विफलताओं के बावजूद इस निर्णायक समझ के लिए उनकी तारीफ करनी होगी कि नेहरू-गांधी परिवार के भरोसे रहना अब कांग्रेस के लिए जानलेवा साबित होगा और अपना वैकल्पिक नेतृत्व उसे हर हाल में चुनना ही होगा। स्वाभाविक है कि पार्टी के दूसरी-तीसरी पांत के नेता अभी आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इस दुविधा से उन्हें बाहर निकालना ही गांधी-नेहरू परिवार की असल परीक्षा है। और यह काम जल्दी होना चाहिए, क्योंकि सोनिया गांधी अगर एक साल भी अंतरिम अध्यक्ष बनी रह गईं तो इसका गलत संदेश जाएगा। अच्छा होगा कि पार्टी किसी युवा नेता को अपना प्रेजिडेंट चुने। पुरानी परंपरा के अनुसार हर अधिवेशन में अध्यक्ष बदला जा सकता है। मूल बात यह है कि कांग्रेस में एक नई कार्य संस्कृति, नई चमक और उत्साह दिखाई दे। भारतीय लोकतंत्र के लिए कांग्रेस आज भी एक अनिवार्य घटक है। उसमें अगर समय से जान फूंकी जा सकी तो यह देश के भविष्य के लिए अच्छा रहेगा।

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