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चंडीगढ़ का 4 वर्षीय भूप्रद अब खाने को चबाने में सक्षम है, 5 मिनट तक बिना सहारे के बैठे रहने में सक्षम है, यह जीवन उपहार उसे न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट से मिला

July 27, 2019 06:17 PM

हाल-फिलहाल तक यही माना जाता था कि जन्म के दौरान मस्तिष्क को होनेवाली क्षति अपरिवर्तनीय होती है। हालांकि अब उभरते अनुसंधान के साथ हम यह जान गए हैं कि सेल थेरेपी का उपयोग कर क्षतिग्रस्त मस्तिष्क के ऊतकों की मरम्मत संभव है। फिर, आज भी भारत में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने गर्भनाल रक्त बैंकों के माध्यम से अपने स्टेम कोशिकाओं को संरक्षित नहीं किया है। उन सभी रोगियों के लिए जिन्होंने न्यूरोलॉजिकल संबंधित विकारों के लिए एक नया इलाज खोजने की सारी उम्मीदें खो दी है, वयस्क स्टेम सेल थेरेपी इस तरह के मरीजों के लिए एक नई आशा प्रदान करता है।

 

न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट हरियाणा और पंजाब में रहनेवाले न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर के सभी मरीजों के लिए 31 अगस्त, 2019 को चंडीगढ़ में एक नि:शुल्क कार्यशाला सह ओपीडी परामर्श शिविर का आयोजन कर रहा हैं। न्यूरोजेन को एहसास है कि स्पाइनल कॉर्ड इंजुरी, मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी, ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी इत्यादि विकारों से पीडि़त मरीजों को सिर्फ परामर्श के उद्देश्य से मुंबई तक की यात्रा करना काफी तकलीफदेह होता है, इसलिए मरीजों की सुविधा के लिए इस शिविर का आयोजन किया जा रहा है।

 

न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट के निदेशक, एलटीएमजी अस्पताल व एलटीएम मेडिकल कॉलेज, सायन के प्रोफेसर व न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक शर्मा ने कहा, ‘‘आटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता, मस्कयुलर डिट्रॉफी, रीढ़ की हड्डी में चोट, लकवा, ब्रेन स्ट्रोक, सेरेब्रेलर एटाक्सिया (अनुमस्तिष्क गतिभंग) और अन्य न्यूरोलॉजिकल (मस्तिष्क संबंधी) विकार जैसी स्थितियों में न्यूरो रीजेनरेटिव रिहैबिलिटेशन थेरेपी उपचार के नए विकल्प के तौर पर उभर रही है। इस उपचार में आण्विक संरचनात्मक और कार्यात्मक स्तर पर क्षतिग्रस्त तंत्रिका ऊतकों की मरम्मत करने की क्षमता है।

 

डॉ. आलोक शर्मा ने आगे कहा, ‘‘न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट में की जानेवाली न्यूरो रीजेनरेटिव रिहैबिलिटेशन थेरेपी (एनआरआरटी) एक बहुत ही सरल और सुरक्षित प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में एक सुई की मदद से मरीज के स्वयं के बोन मैरो (अस्थि मज्जा) से स्टेम सेल ली जाती हैं और प्रसंस्करण के बाद उसके स्पाइनल फ्लुइड (रीढ़ की हड्डी में तरल पदार्थ) में वापस इंजेक्ट की जाती हैं। चूंकि इन कोशिकाओं को मरीज के शरीर से ही लिया जाता है ऐसे में रिजेक्शन (अस्वीकृति), और साइड इफेक्ट (दुष्प्रभाव) का खतरा नहीं रहता है, जो एनआरआरटी को पूरी तरह एक सुरक्षित प्रक्रिया बनाता

 

आज हम 4 वर्षीय भूप्रद कुमार कंवर का डिस्टोनिक सेरेब्रल पाल्सी का ज्ञात मामला पेश कर रहे हैं। अपनी गर्भावस्था के अंतिम दिनों में भूप्रद की मां में अपरा स्तर में कमी का निदान हुआ डॉक्टर ने उन्हें पूरी तरह से आराम करने की सलाह दी। चिमटी के सहारे प्रसव कराया गया था और जन्म के तुरंत बाद भूप्रद कम रोया था। सांस की तकलीफ और कम संतृप्ति स्तर के कारण उसे जन्म के बाद तीसरे दिन एनआईसीयू में भर्ती कराया गया था। इस दौरान उसे तीन बार दौरे पड़े थे, जिसके बाद उसे मिरगी-रोधी दवाएं दी गईं और इसके बाद फिर कभी इसकी पुनरावृत्ति नहीं देखी गई। शैशव अवस्था में स्वाभाविक विकास में कमी देखी गई। विभिन्न परीक्षणों और परामर्शों के बाद सेरेब्रल पाल्सी की पुष्टि हुई और उसका परिवार इसके उपयुक्त उपचार की खोज में जुट गया। भूप्रद के पिता ने पहले परामर्श हेतु न्यूरोजेन बीएसआई से संपर्क किया और आश्वस्त होने के बाद उपचार के लिए आए।

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