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मीडिया मैंनेजमैंट - चुनावी नतीजे

May 22, 2019 01:39 PM



मीडिया मैंनेजमैंट - चुनावी नतीजे

इस बार का चुनाव कई कारणों से पिछले चुनावों से अलग रहा। 36 दिन तक चलने वाला यह लम्बा चुनाव सबसे मंहगा चुनाव रहा। चुनाव अभियान में विज्ञापन सबसे बड़ा खर्चा होता है तथा एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 के मुकाबले विज्ञापनों पर 73 प्रतिशत ज्यादा खर्च 2019 के चुनावी विज्ञापनों पर हुआ। ऐसा इसलिये हुआ कि चुनाव व्यक्तियों के कामों की बजाय उनकी छवियों पर केन्द्रित हो गया। वास्तविक मुद्दों को दरकिनार कर, केवल छवियां घड़ने तथा ब्रांड बनाने में मीडिया लगा रहा । अर्थव्यवस्था पहले से ही बेरोजबारी व कृषि संकट जैसी गंभीर एवं संवदेनशील समस्याओं से गुजर रही है, ऐसे में चुनाव का भारी भरकम अनुत्पादकीय खर्च, अन्ततः मंहगाई ही बढ़ायेगा। नमो-नमो की धुन पर बाजार झूम उठा, अब ज्यादातर एग्जिट पोल ने एन डी ए की वापसी के संकेत दिये। बाजार, विशेषकर सैंसेक्स व निफ्टी ने पूरे दशक में सबसे ऊंची छलांग लगाई। अच्छे दिन आयें या न आयें, पर बाजार में तो बहार आ ही गई। अर्थव्यवस्था के फंडामेन्टलस अर्थात मूल तत्वों में कोई सकारात्मक परिवर्तन न होने पर भी केवल शक्तिशाली सरकार के आने की उम्मीद ने ही बाजार में रौनक लौटा दी। औद्योगिक उत्पादन कम हो रहा है, निवेश सार्वजनिक व निजी दोनों घट रहे हैं, ऐसे में रोजगार की समस्या बढ़ेगी तथा मंहगाई ने तो अभी से ही सिर उठाना शुरू कर दिया है।
वर्ष 2019 के चुनावों के नतीजे कुछ भी हो, लेकिन मंहगाई का बढ़ना तय है तथा आम व्यक्ति के लिये आर्थिक कठिनाइयां बढ़ने ही वाली हैं। राजमर्रा की वस्तुओं के दाम तो बढ़ने ही वाले हैं, लेकिन अमूल ने तो दूध के मूल्य में पहले से ही वृद्धि कर दी है। आर्थिक समस्यायें जैसेकि रोजगार, कीमतें तथा उत्पादन, ये सबसे ज्यादा आम व्यक्ति, जिसमें समाज के सबसे निचले तबके से लेकर मध्यम वर्ग तथा सभी शामिल होते हैं, उनको प्रभावित करते हैं। लेकिन लगता है भारतीय वोटर्स आर्थिक तत्वों के आधार पर वोट ही नहीं करते। आर्थिक मुद्दों पर पिछली सरकार बिल्कुल काफी हद तक असफल रही, चुनावी अभियान में इन मुद्दों की चर्चा तो हुई पर ज्यादा तवज्जों गैर आर्थिक, भावनात्मक तथा राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केन्द्रित रहा। अगर एग्जिट पोल्स के अनुमान सही रहते हैं तो इससे सहज ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मतदाताओं तथा पार्टियों के लिये आर्थिकी तथा अर्थव्यवस्था ज्यादा मायने ही नहीं रखती, आर्थिक नीतियां तथा आर्थिक मुद्दे उनके लिये गौण हैं। वर्ष 2014 के चुनाव में मोदी ने जो जीत हासिल की थी, उसके पीछे उनका ‘‘अच्छे दिन’’ आने का आह्वान ‘‘सबका साथ-सबका विकास’’ तथा ‘‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम प्रशासन’’ जैसे नारे माने जा रहे थे। लेकिन जब लोगों ने नोटबंदी जैसे झटके व जी एस टी, जिसने लघु तथा छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ देने वाली कवायद का सामना किया तो लग रहा था कि वोटर्स आर्थिक परफॉरमेंन्स को भी देखते हैं तथा उसे अपने वोट का आधार बनायेंगे। पर सत्तासीन पार्टी ने पूरे चुनाव अभियान में इन मुद्दों पर चर्चा ही नहीं की। धर्म, जाति तथा राष्ट्रभक्ति जैसे पुराने मुद्दों का नवीनीकरण कर, कुछ अलग तथा नया करने की हवा बनाई। राजनीति और मीडिया की मिलीभगत ने भी मतदान पैटर्न और आमजन की राय को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई। एग्जिट पोल के अनुमान अगर सही नतीजों में बदलते हैं तथा भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार पूर्ण बहुमत में आ सत्ता संभालती है तो निश्चित तौर पर मीडिया मैनेजमैंट की जीत है, चुनावी अभियान सफल चलाने की जीत है, देश चले न चले, अर्थव्यवस्था आगे बढ़े न बढ़े, रोज़गार बढ़े न बढ़े। अन्त में, कवि की प्रसिद्ध पक्तियां ‘‘सफल वही है आजकल, वही हुआ सिरमौर जिसकी कथनी और करनी और, जंगल-जंगल आज भी नाच रहे हैं मोर, लेकिन बस्ती में मिले घर-घर आदमखोर, हर कोई हमको मिले पहने हुए नकाब, किसको अब अच्छा कहे, किसको कहे खराब।’’

डा0 क. कली

 
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