Monday, May 20, 2019
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BHASKAR EDIT- राजनीतिक दलों को जब तक कुछ खोने का डर नहीं होगा, आचार संहिता यूं ही टूटती रहेगी।

May 16, 2019 05:55 AM

COURTESY DAINIK BHASKAR MAY 16

चुनाव आयोग को 17वीं लोकसभा के इस चुनाव को आगामी चुनाव में केस स्टडी की तरह लेना चाहिए। क्या लोकसभा के चुनाव सात चरणों में होने चाहिए? इस बार चुनाव में गाली-गलौज, वाद-विवाद, तर्क-वितर्क, मारपीट और तोड़फोड़ की घटनाओं को देखने से शायद यही स्पष्ट होता है कि चुनाव तीन या चार दौर से लंबे नहीं होने चाहिए। लंबे दौर के इस चुनाव कार्यक्रम की वजह से प्रधानमंत्री और राहुल गांधी जैसे नेताओं को एक-एक राज्य में दस से बारह चुनावी सभाएं, रोड शो करने का अवसर मिला। स्थानीय नेता तो हर संसदीय क्षेत्र में दो से चार सभाएं करने में कामयाब हो गए। जितना लंबा समय उतना ही दुरुपयोग। चुनाव आचार संहिता की जिस तरह धज्जियां उड़ीं शायद ही इससे पहले ऐसी नौबत आई हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि चुनाव आयोग कई मामलों में फैसला लेने की स्थिति में असहाय, असमजंस में नज़र आया। नेताओं के मुंह से निकलने वाले विवादास्पद बयानों को छोड़ भी दें तो इस बार नेताओं द्वारा चुनाव आचार संहिता को खुलेआम तोड़ा-मरोड़ा गया। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच में जिस तरह की जमीनी जंग देखने को मिली उससे चुनाव आयोग की क्षमता और साख पर सवाल उठे। इस बार चुनाव में जातिवाद, क्षेत्रवाद, वर्गवाद के आधार पर जैसा पक्षपात देखने को मिला शायद ही पहले कभी दिखा हो। राजनीतिक दलों ने तो एक तरह से चुनाव आयोग की पूरी अनदेखी ही की, क्योंकि चुनाव आयोग सख्ती से पेश नहीं आया। बड़ी-से-बड़ी सजा यानी 72 घंटे के बैन से भी बात नहीं बनी। चुनाव आयोग की सख्ती का खौफ तो था ही नहीं आया, आयोग खुद कहीं-न-कहीं सातों चरणों के दबाव में नज़र आया। चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के खर्च पर ही कड़ाई करता तो शायद चुनाव कुछ नए फॉर्मेट में नज़र आता लेकिन, हुआ बिल्कुल उल्टा। पार्टियों ने आयोग की हर कड़ाई का रास्ता ढ़ूंढ़ रखा था। लोकसभा चुनाव में अगर चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे तो आगे स्थिति और खराब होगी। बिना भय नेताओं की सेहत पर कोई असर नहीं होता। हर राज्य की अपनी एक कहानी है। ऐसे में चुनाव आचार संहिता के पालन का एक ही मूलमंत्र होना चाहिए- कड़ाई। राजनीतिक दलों को जब तक कुछ खोने का डर नहीं होगा, आचार संहिता यूं ही टूटती रहेगी।

 
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