Monday, May 20, 2019
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मोदीमय 2019 का चुनाव अभियान

April 30, 2019 04:07 PM

चुनाव का महापर्व अब लगभग अन्तिम चरणों में पहंुच गया है, अब नजरे परिणामों की तरफ लगनी शुरू हो जाएगी, पर अगर रूक कर  चुनाव अभियानों का अध्ययन व विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट दिखाई देता है कि ये अभियान व्यक्ति केन्द्रित रहें तथा वोटर्स का ध्यान मुददों, समस्याओं और तथ्यों से भटका कर, भावनाओं को उत्तेजित कर भ्रमित करने का रहा । जातिगत पहचान तथा उसके समीकरण, अब भी राजनेताओं के लिए अहम हैं तथा वोट बटोरने का सबसे आसान तरीका है । भारतीय जनता पार्टी की तरफ से जहां पूरा चुनाव अभियान मोदीमय रहा, उन्होंने अपनी लोकप्रिय छवि जोकि पिछले पांच वर्षों में तथा उनके मीडिया सहयोगियों ने बनायी, उसका भरपूर दोहन किया । 2019 के चुनाव में निरन्तर यह धारणा बनाई गयी कि ‘‘मोदी नही ंतो कौन ‘‘ उनके अपरिहायर्ता को जनमानस में ठूसने का प्रयास चैबीस घण्टे मीडिया लगातार कर रहा हैं । एक राजनैतिक व्यक्तित्व, गैर राजनैतिक व्यक्ति को गैर राजनैतिक साक्षात्कार देता है, अर्थात उनकी सार्जवनिक छवि में जनता को उनके निजी व्यक्तित्व को झांकने का अवसर मिले । उनकी उपलब्धियों, पार्टी की उपलब्धियों, 5 साल की सरकार की उपलब्धियों की चर्चा न करो, केवल वहीं है जो राष्ट्र की सुरक्षा, संस्कृति की अस्मिता तथा धर्म का संरक्षण करने में सुयोग्य तथा समर्थ हैं । यह चुनाव चाहे मोदी भक्तों की दृष्टि से देखा जाए या मोदी विरोधियों की दृष्टि से देखा जाए, चर्चा तथा विश्लेषण उनके उपर ही केन्द्रित हो गया है या ऐसा जानबूझ कर किया जा रहा है । 2004 के चुनाव में भी इण्डिया शाईनिंग कैम्पेन भी जोर शोर से चला, पर वह चुनाव अभियान कहीं भी व्यक्ति केन्द्रित नहीं था, लोकतंत्र में जनता ही महत्वपूर्ण होती है, पर अब नेता ही महत्वपूर्ण हो गये है या सत्तासीनों के महिमा मंडन पर ही केन्द्रित हो गये हैं। मोदीमय चुनाव अभियान से तो ऐसा लगता है कि न तो भाजपा चुनाव लड़ रही है न उनके उम्मीदवार, सब कुछ मोदी जी के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं। चुनाव अभियान में चायवाला, चैकीदार, अति पिछड़ा, जो भी अब की बार जुमले आये हैं, उनमें न नीतियों की चर्चा है, न उनके निष्पादन का ब्यौरा है, न उपलब्धियों का तथ्यपरक विश्लेषण है, बस शब्दों की जादूगरी तथा वक्तव्य कला से जनता को लुभाये हुए हैं । उनके भाषण में नारे, जुमले, जो पिछले चुनाव में देखे व सुने गये, इस बार वो पूर्णतयः गायब है । कहते है कि कपड़ो से इत्तर की खुशबू आना आम बात है, पर किरदार से खुशबू आये, ये बड़ी बात होती है ।  पर मोदी जी ने ऐसा जलसा रचा है कि उनके कपड़े तथा किरदार, दोनों से ही इत्तर की सरोबार होने की खुशबू आ रही है पर ये सत्ता का केन्द्रियकरण लोकतंत्र के लिए सहीं नहीं है । राजनैतिक लोकतंत्र - सामुहिकता पर आधारित होते हैं, वे व्यक्ति केन्द्रित नहीं होते । भारत में आर्थिक जनतंत्र तथा सामाजिक जनतंत्र तो कभी आया ही नहीं, पर अब तो लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली का अर्थ भी बदलता जा रहा है । नेता की व्यक्तिवादी पूजा यद्यपि भारतीयों के डीएनए में हैं, कालांतर में भी नेता अपनी लोकप्रिय उपस्थिति से इस तरह से जनजीवन पर पूरी तरह से छाये रहे हैं,पर आज तो वह न केवल पार्टी पर हावी हैं, पार्टी की विचारधारा पर भी भारी है तथा उनके सामने न केवल उनकी पार्टी के शीर्ष नेता अपितु संबंधित दलों के नेता जैसे नितीश कुमार, रामविलास पासवान सब दडंवत करते नजर आते हैं । समकालीन समय में चुनाव अभियान चलाने, चुनाव जीतने का जितना मादा व शक्ति मोदी जी में देखी गयी उतनी शायद ही इत्तर में कहीं देखी गयी हो, पर ‘‘ अब किसी को नजर आती नहीं कोई दरार घर की ही दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार ।                  

                    डा0 क0कली

 
 
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