Wednesday, May 22, 2019
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International

आतंकी हमला - कट्टरता का जनून

April 24, 2019 02:47 PM

आतंकी हमले, सिलसिलेवार बम्ब बलास्ट, सैकड़ोंझारों बेकसूर-निरीह लोगों का मारा जाना, बेवजह रक्तपात, कौन से धर्म, कौन सी सभ्यता, कौन सी संस्कृति को स्थापित कर रहे हैं। न्यूजीलैंड में मस्जिद में शांति से नमाज पढ़ रहे लोगों पर बंधुकधारियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर असंख्य लोगों को मौत के मंुह में धकेल दिया तो अब श्रीलंका में ईस्टर के मौके पर ईसाई समुदाय पर तीन गिरिजाघरों व तीन पांच सितारा होटलस पर आठ बम्ब धमाके कर सैकड़ों लोग मारे गये और असंख्य घायल हो गये। यह क्रूर हमला ईसाई-इस्लाम धर्म के बीच खिंचती नफरत की लकीर को दर्शाता है। एक के बाद एक आत्मघाती हमलों से केवल श्रीलंका ही नहीं कांपा अपितु पूरे विश्व का हृद्य आतंक से दहल गया। पूरे दशक की शांति-एलटीटीई का खूनी संघर्ष, जोकि इतिहास की बात बन चुकी थी, फिर से ताजा हो गई है तथा पड़ौसी देश में राजनैतिक अस्थिरता बन गई है। आतंकी हमले, मानवीय सभ्यता व संस्कृति के लिये तो खतरा पैदा कर ही रहे हैं, पूरी मानव जाति को लील जाने की सम्भावना उनमें छिपी है। आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता, क्योंकि कोई धर्म नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, सब बड़े धार्मिक नेता प्रार्थनायें-सभायें करते हैं, बड़े-बड़े राजनेता अफसोस प्रकट करते हैं, लानत देते हैं, शर्मनाक बताते हैं, क्रूर हिंसा का विरोध करने के लिये आतंक के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान करते हैं।

आतंक की जड़े उन्माद तथा नफरत के बीजों से पनपती है। आतंक का भस्मासूर आज मानवता के लिये सबसे बड़ी चुनौती बन कर खड़ा है। संवेदनशील व्यक्ति हो या राष्ट्र, ये समझने में असमर्थ रहते हैं कि आतंकवादी कैसे पैदा होते हैं तथा इनसे कैसे निपटा जाये। शक्तिशाली विकसित देश हो या छोटे-छोटे विकासशील देश, सब आज इसकी गिरफ्त में हैं। मानव आज जितना असुरक्षित है, इतने विज्ञान व टैक्नोलाजी के संसाधनों से सम्पन्न होने पर भी पहले कभी नहीं था। प्राकृतिक आपदायें, जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे आतंकवाद के सामने बौने प्रतीत होते हैं। आदमी आज अपने आपको पूरी मानवता को समाप्त करने पर आमदा है। आज सुरक्षित न तू है, सुरक्षित न मैं हूं, खौफ बदलते रहते हैं, कैलेण्डर बदलते हैं, दीवार वहीं रहती है अर्थात आतंक को फैलने के लिये बस एक बहाना चाहिये होता है, जरा सी राजनैतिक अस्थिरता की गीली जमीन चाहिये होती, फिर क्या है - आतंक का ज्वालामुखी फट पड़ता है। आज आतंक से लड़ने के लिये सबको एकजुट होना होगा। समर्थ व सम्पन्न राष्ट्रों को एक-दूसरे के साथ हाथ मिलाकर, इस समस्या से निजात पानी होगी। दहशतगर्दों के हाथ में धर्म जब आता है तो वह धर्म न रहकर उन्माद व हिंसा में बदल जाता है। अंत में ‘‘कागज पर रखकर रोटियां खाऊं मैं कैसे, खून से लथपथ आता है अखबार आज का !

                  प्रो0.क.कली

 
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