Wednesday, July 24, 2019
Follow us on
BREAKING NEWS
हरियाणा लोक। सेवा आयोग का एग्जाम जो आज होना था वो एक दिन पहले खट्टर सरकार ने कैंसल कर दिया:करण सिंह दलालहरियाणा किलोमीटर स्कीम के घोटाले को लेकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल,उनके मंत्री और बड़े अफ़सर के खिलाफ हम हाई कोर्ट में जाएंगे और उनको सजा दिलवाकर चैन से बैठूंगा:करण सिंह दलालहरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल भष्टाचार में संग्लन है:करण सिंह दलालचंडीगढ़:करण सिंह दलाल ने हरियाणा किलोमीटर स्कीम को लेकर खट्टर सरकार पर निशाना साधाफिल्म 'सुपर 30' दिल्ली में टैक्स फ्री, सरकारी स्कूल के शिक्षकों के लिए स्पेशल स्क्रीनिंगकर्नाटक में सरकार बनाने का दावा पेश करेगी BJP, शुक्रवार शाम 4 बजे हो सकता है शपथग्रहण: सूत्रपर्यावरण नियमों की मंजूरी लिए बिना रेत खनन मामले में सुप्रीम कोर्ट का 5 राज्य सरकारों को नोटिसमॉब लिंचिंग पर 49 सेलिब्रिटी ने पीएम नरेंद्र मोदी को लिखी चिट्ठी
 
National

चुनाव और उनका आर्थिक पहलू

April 23, 2019 04:14 PM

चुनाव और उनका आर्थिक पहलू
प्रजातंत्र सरकार चलाने की सबसे मंहगी व्यवस्था है, लेकिन इसके अनिवार्यतः फायदों के कारण ही चर्चिल ने इसे सबसे खराब प्रारूप कहा, पर बाकी सब व्यवस्थाओं से इसे बेहतर बताया । चुनावों का आर्थिक पहलू भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, 2019 के चुनावों को भारत में अब तक का सबसे मंहगा चुनाव बताया जा रहा है । जिस प्रकार भारत में विवाह-शादियां दिनप्रतिदिन मंहगे होते जा रहे हैं तथा उनका स्थायित्व घटता जा रहा है, उसी प्रकार चुनावी उत्सव भी आर्थिक नजर से उत्तर की ओर मुंह किए निरंतर मंहगे होते जा रहे हैं, पर वे पुराने ढरें-जाति, धर्म, भाषा जैसे प्राथमिकतावादी मुद्दों पर ही लड़े जा रहे हैं। मालूम नहीं होता कि हम आगे जा रहे है या पीछे पिछड़ रहे हैं । ब्राहम्णवाद, भूमिहार, बंधुआ, अगड़े-पिछड़े, जाट-बनिया, जाति पहचान आज जितनी बलवती हो रही है, पहले कभी भी इतनी सुनने में नहीं आती थी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी जात-पहचान को आगे रखते हुए झारखंड में अपने को तेली ‘‘बता‘‘ तेली बहुल इलाके के वोटों को लेने के लिए जाति कार्ड खेल रहे हैं । ये कोई नई बात नहीं है, जाति समीकरण आज उतने ही सत्य है, जितने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय थे, राष्ट्रवाद तथा हिंदु मुस्लिम के मुद्दे पर आज समाज जितना बंटा है, पहले कभी इतना नहीं था । अर्थिक विकास, जोकि मुख्य मुद्दा होना चाहिए, क्योंकि बिना आर्थिक स्वतंत्रता के राजनैतिक स्वतंत्रता का मूल्य धीरे धीरे खत्म हो जाएगा, क्योंकि भूखे व्यक्ति को ‘‘ रोटी‘‘ चाहिए न कि ‘‘ वोट का अधिकार‘‘ । ‘‘ पेट न पइंया रोटियां ते सबे गलां खोटियां ‘‘ अन्ततः व्यक्ति व समाज का कल्याण उसके आर्थिक कल्याण से ही जुड़ा होता है । रोजगार, उत्पादन, उपभाग - जो मिलकर जीवन स्तर बनाते हैं, उसके मूल में आर्थिक विकास ही छिपा है । सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए समाज व संस्कृति से पहले हर व्यक्ति को काम तथा आर्थिक साधन मिलने जरूरी है । आर्थिक पहलू से चुनाव अपने आप में एक अनुत्पादकीय क्रिया है । अल्पकाल में जरूर मांग तथा रोजगार के अवसर बढ़ते है, पर उनका आर्थिक मूल्यांकन तथा समीक्षा करनी जरूरी है । क्या हमारी अर्थव्यवस्था इस निरंतर बढ़ते खर्च को वहन करने में समर्थ है । क्या इनको सरल तथा सस्ता बनाया जा सकता है , बढ़ती आर्थिक विषमतांए प्रजातंत्र व्यवस्था के मूल आधार ‘‘ सभी बराबर है‘‘ के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं । अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई प्रजातंात्रिक अवधारणाआंे को सिरे से खत्म करने की चेतावनी है । चुनावों के राजनैतिक व आर्थिक पहलू दोनों ही महत्वपूर्ण है, अतः दोनों को मद्देनजर रखना अनिवार्य हैं । युवा भारत में आज इस सब्जैक्ट पर तथा इसकी गंभीरता पर ध्यान देना बहुत जरूरी है, नहीं तो प्रजातंत्र था तो चुनाव थे, चुनाव न होते तो प्रजातंत्र कैसे होता, इसी का तो रोना है, अगर प्रजातंत्र न होता तो क्या होता ।

डा0 क0 कली

Have something to say? Post your comment