Wednesday, June 26, 2019
Follow us on
National

दक्षिण भारत में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की अपील बेअसर हवा किस ओर? : भाजपा को लेकर दक्षिण में चिंता उसका कथित उत्तर भारतीय पूर्वाग्रह है

April 14, 2019 07:26 AM

COURTESY DAINIK BHASKAR APRIIL 14

दक्षिण भारत में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की अपील बेअसर
हवा किस ओर? : भाजपा को लेकर दक्षिण में चिंता उसका कथित उत्तर भारतीय पूर्वाग्रह है

अ गर आप राष्ट्रीय अखबारों को पढ़कर यह सोचते हैं कि लोकसभा चुनाव इस बात पर निर्भर है कि क्या एक मजबूत हिन्दू राष्ट्रवादी नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी की अपील उत्तर प्रदेश और बिहार में उन्हें रोकने के लिए बने गठबंधनों पर भारी पड़ेगी, तो आपको माफ किया जा सकता है। यह ऐसा है कि जैसे दक्षिण भारत कोई मायने ही नहीं रखता।
यह धारणा पाकिस्तान के साथ हुई झड़पों के बाद बनी है, क्योंकि पाकिस्तान विरोधी भावनाएं उत्तर भारत में ज्यादा प्रभावी हैं। अगर यह राष्ट्रवाद और बढ़ता है, तो भी भाजपा के लिए उत्तर भारत में 2014 का प्रदर्शन दोहराना मुश्किल होगा, क्योंकि उसने 90% सीटें यहां से ही जीती थीं। उस समय पूरा विपक्ष बंटा हुआ था, जो अब काफी हद तक एकजुट है। दक्षिण में तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की 129 में से सिर्फ 21 सीटें ही भाजपा के पास थीं। भले ही दक्षिण की नाराजगी इस चुनाव का फैसला न करे तो भी लंबी अवधि में एक भारत के भाजपा के विजन में यह रोड़ा ताे रहेगा ही। कर्नाटक को छोड़ दें तो भाजपा के हिन्दुत्व की अपील का दक्षिण भारत में कभी भी ज्यादा असर नहीं रहा। हिन्दी को बढ़ावा देने का मामला हो या फिर जनसंख्या और उपभोग के आधार पर राजस्व के बंटवारे का प्रयास हो, क्रेंद के ये प्रयास दक्षिण भारत को कभी पसंद नहीं आए। जब हम विधानसभा चुनावों में तमिलनाडु आए थे तो हमने यहां पर तमिलनाडु की विशेष राजनीतिक संस्कृति को देखा। जिसमें जयललिता व करुणानिधि जैसे पूर्व फिल्मस्टारों के प्रति दीवानगी थी। राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का यहां कोई वजूद नहीं था। दक्षिण विरोध से उबरना भाजपा के लिए चुनौती है, क्योंकि इस क्षेत्र में मोदी का करिश्मा निष्प्रभावी है। पिछले साल मई में कर्नाटक में हमने पाया कि तटीय इलाकों में भाजपा का असर ज्यादा है पर भीतरी इलाकों में पार्टी के स्थानीय नेता योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं से दूरी बनाना ही पसंद करते हैं। जैसे-जैसे हम बेंगलुरू की ओर बढ़े भाजपा का समर्थन घटता गया। यह सिर्फ मोदी का सवाल नहीं है। दक्षिण के हर राज्य की अपनी अलग संस्कृति होने की वजह से वे किसी उत्तर भारतीय नेता की तुलना में अपने क्षेत्रीय नेताओं से ही भावनात्मक लगाव रखते हैं। अपनी अन्य चुनाव यात्राओं में हमें पता चला कि भाजपा के प्रति लोगों की बड़ी चिंता उसका हिंदू केंद्रित होना नहीं, बल्कि उसका कथित उत्तर भारतीय पूर्वाग्रह है। टैक्स बंटवारे पर नाराजगी के साथ ही दक्षिणी राज्यों के आपसी विवाद और अपनी खास पहचान को बनाए रखने की ललक भी विरोधाभासी है। इसी वजह से दक्षिण में कभी भी उत्तर की तरह संयुक्त मोर्चा नहीं बन सका। उत्तर और दक्षिण बहुत अलग हैं, इसलिए दाेनों को संतुष्ट करना असंभव है और यह किसी राष्ट्रवादी आंदोलन की संभावना पर भी ब्रेक लगाता है।
एनालिसिस
रुचिर शर्मा : विश्व के 50 प्रभावशाली लोगों में शामिल हैं
दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या कम है और संपदा व उत्पादकता अधिक। इसलिए यहां के वोटरों को लंबे समय से लगता है कि उनके टैक्स से गरीब उत्तरी राज्यों को सब्सिडी दी जा रही है।

Have something to say? Post your comment
 
More National News
Central deputation of Brajendra Navnita IAS as Joint Secretary in PMO extended
B.C.Pathak,Distinguished Scientist,NPCCIL will be now Director(Projects)in NPCCIL.
Sarada Kumar Hota,General Managaer,Canara Bank becomes Managing Director, National Housing Bank .
प्रधानमंत्री ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर उठाए गए सवालों की आलोचना प्रवर्तन निदेशालय ने गुजरात की फार्मास्यूटिकल कम्पनी स्टर्लिंग बायोटेक के खिलाफ मनी लांड्रिग जांच के सिलसिले में नौ हजार करोड़ रुपय मूल्य से अधिक की सम्पित जब्त की है।. असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर मसौदे में एक लाख से अधिक लोगों के नामों को हटाने वाली अतिरिक्त सूची प्रकाशित। इंदौरः निगम अधिकारी से मारपीट के मामले में बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय गिरफ्तार नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत का कार्यकाल सरकार ने दो साल बढ़ाया
रॉ चीफ बने 1984 बैच के सामंत गोयल, अरविंद कुमार बनाए गए आईबी डायरेक्टर
लोकसभा चुनाव हारने वाले 21 प्रत्याशियों से मिलेंगे कांग्रेस कर्नाटक के प्रभारी वेणुगोपाल