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Haryana

HARYANA- अपराधियों को सजा दिलाने में अहम बायोलॉजिकल एविडेंस अलमारियों मे बंद, सैंपल लेने नहीं आ रहे जिम्मेदार पुलिसकर्मी

February 11, 2019 05:13 AM


COURTESY DAINIK BHASKAR FEB 11

घोर लापरवाही

पुलिस की अनदेखी अपराधियों के लिए बन रही राहत का सबब
भूपेश मथुरिया | हिसार
अपराधी को उसके गुनाहों की सजा दिलाने में साक्ष्यों का अहम रोल रहता है। अदालत भी गवाहों के मुकरने पर साक्ष्यों को आधार मानकर फैसला सुनाती है। विशेषकर महिला विरुद्ध अपराधों व जहर संबंधित केसों में जुटाए जैविक साक्ष्य काफी महत्वपूर्ण होते हैं। इस व्यवस्था की जिम्मेदार पुलिस ही अगर साक्ष्यों की अनदेखी करने लगे तो नि:संदेह उसका लाभ अपराधी को मिलेगा। ऐसा ही कुछ हिसार के सिविल अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में देखने काे मिल रहा है।
यहां डॉक्टर रूम से लेकर माइनर ओटी कक्ष और अलमारियों में पिछले 15 दिनों से लेकर 5 माह पुराने 20 से 25 सील लगे जैविक साक्ष्य यानी बायोलॉजिकल एविडेंस धूल फांक रहे हैं। वार्ड में तैनात डॉक्टर व स्टाफ नर्स काफी बार साक्ष्यों के बारे में पुलिस कर्मियों को बताते हैं मगर किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। पुलिस कर्मी विशेषकर अनुसंधानकर्ताओं की इस घोर लापरवाही के चलते पीड़ितों को न्याय तो दूर अपराधी को काेर्ट में राहत मिलती है।
15 दिनों से लेकर 5 माह पुराने एविडेंस की हो रही अनदेखी
अपराधियों को सजा दिलाने में अहम बायोलॉजिकल एविडेंस अलमारियों मे बंद, सैंपल लेने नहीं आ रहे जिम्मेदार पुलिसकर्मी
जैविक साक्ष्यों में ये शामिल
इमरजेंसी वार्ड में जैविक साक्ष्य रखे हुए हैं जिन्हें बायोलॉजिकल एविडेंस कहा जाता है। ये साक्ष्य महिला विरुद्ध अपराध जैसे की दुष्कर्म, छेड़छाड़, कुकर्म के अलावा जहर संबंधित मामलों में जुटाए जाते हैं। इनमें स्वैब सैंपल, बाल, खून, लार, आरोपी के कपड़े शामिल हैं। कपड़ों का पुलिंदा तैयार होता है तो बाकी साक्ष्यों के सैंपल तैयार करके सिविल अस्पताल की सील लगा दी जाती है।
ट्रेकिया सॉफ्टवेयर से दूर होंगी मैन्युअल खामियां
पुलिस प्रशासन निष्पक्ष एवं पारदर्शी व्यवस्था शुरू करने जा रही है। फोरेंसिक जांच प्रणाली में व्यापक फेरबदल किया जा रहा है। फोरेंसिक लैब तक एविडेंस सैंपल पहुंचाने व उनकी जांच करके रिपोर्ट तैयार करने तक का काम ऑनलाइन किया जाएगा। बकायदा सैंपल की बार कोडिंग होगी, जिसके लिए विशेष ट्रेकिया सॉफ्टवेयर तैयार हुआ है। इसमें अनुसंधानकर्ता से लेकर एसएचओ, डीएसपी व एसपी तक की जिम्मेदारी फिक्स होगी। साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना नहीं रहेगी। सरकारी अस्पताल में साक्ष्यों का सैंपल लेकर उन्हें सील लगाने के बाद अधिकारियों से जांच के पश्चात लैब में भिजवाया जाएगा। इससे समय पर सैंपल लैब में जांच के लिए पहुंचेगा और उसकी समय पर रिपोर्ट आएगी। अगर किसी भी स्तर पर जांच अटकी या सैंपल लैब में नहीं पहुंचा तो सॉफ्टवेयर से जिम्मेदार का पता लग जाएगा।
2 किस्सों से समझिए जैिवक साक्ष्य की अहमियत
सिविल अस्पताल में रखे बायोलॉजिकल एविडेंस की यह तस्वीर जिम्मेदार पुलिस की घोर लापरवाही को उजागर करती है।
एक्सपर्ट व्यू : 80% मामलों में साक्ष्यों की अनदेखी का अपराधी को मिलता है फायदा

महिला के विरुद्ध अपराधों में जैविक साक्ष्य ही सजा का मुख्य आधार बनते हैं। इनकी जांच समय पर न होने का अपराधी फायदा उठा लेते हैं। 80% मामलों में आरोपियों के बरी होने के पीछे साक्ष्यों की अनदेखी व उनसे छेड़छाड़ रहता है। इसका पता भी अदालत के फैसले के वक्त चलता है, जब साक्ष्यों की रिपोर्ट केस फाइल पर नहीं होती है। अगर होती है तो वह उक्त कारणों से अस्पष्ट होती है। अगर अनुसंधानकर्ता साक्ष्यों की अनदेखी करता है तो उसके विरुद्ध पुलिस प्रशासन डिपार्टमेंटल एक्शन ले सकता है। - लाल बहादुर खोवाल, वरिष्ठ अधिवक्ता
1. एफएसएल रिपोर्ट देरी आने से आरोपी को दुष्कर्म केस में मिल गई थी राहत
एक कॉलेज में छात्रा ने फांसी लगाकर सुसाइड कर लिया था। उसने सुसाइड नोट लिखा था कि मेरे साथ शादी का झांसा देकर दुष्कर्म किया गया। पुलिस ने मामले में परिजनों के बयान पर आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म व आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज किया था। पुलिस ने दुष्कर्म की पुष्टि के लिए सैंपल लिए थे मगर उनकी जांच रिपोर्ट एक साल तक नहीं आई। कोर्ट में ट्रायल चला तो रिपोर्ट में देरी का फायदा उठाकर आरोपी पक्ष ने पीड़ित पक्ष पर दबाव बना लिया, जिससे वे गवाही से मुकर गए। अदालत ने रिपोर्ट में देरी के कारण दुष्कर्म की धारा में आरोपी को राहत देकर सुसाइड नोट के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी मानकर सजा सुनाई थी।
2. आरोपी के ब्लड सैंपल के आधार पर कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई
जिले के एक गांव में नाबालिग से कुकर्म मामले का कोर्ट में ट्रायल चल रहा था। तब केस फाइल पर डीएनए एफएसएल रिपोर्ट नहीं थी। जज ने संबंधित अनुसंधानकर्ता से पूछा तो पता चला कि आरोपी का ब्लड सैंपल लिया ही नहीं था। सिर्फ पीड़ित के सैंपल ही भेजे थे। कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लेकर लापरवाही पर फटकार लगाई और आरोपी का ब्लड सैंपल जांच के लिए लैब में भिजवाने के आदेश दिए। पुलिसकर्मियों ने सैंपल भिजवाए तो जांच रिपोर्ट में कुकर्म की पुष्टि हुई। हाल ही में अदालत ने इस एविडेंस के आधार पर आरोपी काे दोषी करार देकर 10 साल की सजा सुनाई है।
जांच की ऑनलाइन व्यवस्था कराएंगे
अनुसंधानकर्ता अगर सैंपल छोड़कर जाते हैं तो यह गलत है। महिला एवं बच्चों के विरुद्ध अपराधिक केसों में साक्ष्यों की अनदेखी लापरवाही उजागर करती है। इस संबंध में संज्ञान लिया जाएगा। सभी सैंपल कलेक्ट करवाकर जांच की जाएगी कि किस थाना व अनुसंधानकर्ता द्वारा छोड़े गए हैं। जल्द ही ट्रेकिया सॉफ्टवेयर प्रयोग में लाकर सैंपल कलेक्शन व निष्पक्ष जांच की ऑनलाइन व्यवस्था करवा रहे हैं। -डॉ. अजय, असिस्टेंट डायरेक्टर सीन ऑफ क्राइम यूनिट
पुलिस विभाग मामले को गंभीरता से लेगा
अगर पुलिस कर्मी साक्ष्यों के सैंपल लेकर नहीं जाते हैं तो इस संबंध में नोटिस चस्पाया जाएगा। पुलिस विभाग भी मामले में गंभीरता से संज्ञान लेकर सैंपल कलेक्ट करके संबंधित थाना में भिजवाए ताकि निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच के लिए सैंपल जांच के लिए फोरेंसिक लैब में भेजे जा सकें। - डॉ. टीपी शर्मा, डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट सिविल अस्पताल हिसार

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