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Haryana

क्या नए पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति से पूर्व कार्यवाहक डी.जी.पी. लगाएगी हरियाणा सरकार ?

January 31, 2019 09:13 PM

विकेश शर्मा 

चंडीगढ़ :क्या हरियाणा के पुलिस महानिदेशक (डी.जी.पी.)  बलजीत सिंह संधू, जिनकी सेवानिवृति आज 31 जनवरी को हो गयी है एवं उनके  उत्तराधिकारी की  चयन प्रक्रिया अभी पूर्ण नहीं हुई है, ऐसे में  नए डी.जी.पी. की औपचारिक नियुक्ति होने  से पूर्व राज्य सरकार कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक नियुक्त करेगी  ? ज्ञात रहे कि हरियाणा की खट्टर सरकार द्वारा राज्य पुलिस के अगले डी.जी.पी.  की नियुक्ति के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनुपालना करते हुए  संघ लोक सेवा आयोग (यू.पी.एस.सी.) को उपयुक्त भारतीय पुलिस सेवा (आई.पी.एस.) अधिकारियों के नाम तो लगभग दो सप्ताह पहले भेज दिए गए थे, परन्तु गत दिनों ऐसी खबरें आयी है कि यू.पी.एस.सी. द्वारा हरियाणा सरकार द्वारा  भेजे गए उक्त नामो में कुछ के सम्बन्ध में  संलग्न दस्तावेजों में आंशिक कमियां पायी गई हैं एवं इस कारण यह वांछित दस्तावेज राज्य सरकार द्वारा यू.पी.एस.सी. को मुहैया करवाए जा गए  हैं जिस कारण यू.पी.एस.सी की इस सम्बन्ध में  इम्पैनल्मेंट समिति की मीटिंग में कुछ विलम्ब  हो गया  है. इसी बीच प्रश्न यह उठता है की क्या इस नियुक्ति प्रक्रिया  के पूर्ण होने तक हरियाणा सरकार द्वारा कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति की जा सकती है ?  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार बे बताया कि चूँकि सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 3 जुलाई 2018  को दिए अपने आदेशों में किसी भी राज्य  को कार्यवाहक डी.जी.पी. नियुक्त करने से स्पष्ट तौर पर मना किया था क्योंकि कोर्ट के अनुसार कार्यवाहक डी.जी.पी. लगाने की संकल्पना सुप्रीम कोर्ट द्वारा सितम्बर, 2006 में देश में पुलिस सुधारो द्वारा दिए नए निर्णय - प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार में कहीं नहीं थी, अत: कोई भी राज्य सरकार  कार्यवाहक डी.जी.पी. नहीं लगा सकती. एडवोकेट हेमंत ने बताया कि अगर आज सेवानिवृत हो गए  पुलिस महानिदेशक संधू को अगले कुछ दिनों के लिए अर्थात उनके उत्तराधिकारी की चयन प्रक्रिया पूर्ण होने तक ही सही अपने पद पर बनाये रखा जाता एवं  इस बाबत  प्रासंगिक आदेश  भारत सरकार के कैबिनेट सचिवालय के अंतर्गत आने वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति सम्बन्धी कमेटी ने ले लिया होता, तो कदापि ऐसी अड़चन न आती. अब यह देखने लायक होगा कि राज्य सरकार स्टॉप-गैप अरेंजमेंट के तौर पर ही  सही क्या राज्य पुलिस महानिदेशक के पद का चार्ज राज्य के किसी वरिष्ठम पुलिस महानिदेशक रैंक के अधिकारी को प्रदान करती है और अगर ऐसा किया जाता है को क्या यह सुप्रीम कोर्ट के कार्यवाहक डी.जी.पी. न लगाने के आदेशों की अवहेलना तो  नहीं होगी ?   हेमंत ने बताया कि जिस प्रकार उक्त कैबिनेट कमेटी ने पंजाब के पुलिस महानिदेशक सुरेश अरोड़ा को गत 16  जनवरी को इस वर्ष 30 सितम्बर 2019 तक  उनकी सेवा में एक्सटेंशन प्रदान किया था हालांकि डी.जी.पी. अरोड़ा ने इस एक्सटेंशन को लेने में असमर्थता  दिखाई एवं इस कारण पंजाब सरकार ने भी उनके उत्तराधिकारी के चयन के लिए उपयुक्त आई.पी.एस. अधिकारीयों के नाम यू.पी.एस.सी को भेज दिए है एवं वह नियुक्ति कवायद भी जारी है हालांकि यह स्पष्ट हो गया था  कि  अरोड़ा अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति होने तक अपने पद पर बने रहेंगे. इसी प्रकार अगर हरियाणा के निवर्तमान  डी.जी.पी. संधू को भी अपने पद पर अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति होने तक बनाये रखा जाना चाहिए था और राज्य सरकार तो यह तो सुप्रीम कोर्ट में इस बात का पक्ष रखा जाना चाहिए था या   उक्त नियुक्ति सम्बन्धी केंद्रीय कैबिनेट की कमेटी को संधू को उनके  उत्तराधिकारी की चयन प्रक्रिया पूरी होने तक उचित एक्सटेंशन देने बाबत आदेश करने जारी करने बाबत लिखा जाना चाहिए था. ज्ञात रहे कि इस  माह  16 जनवरी को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा एवं तीन अन्य राज्य सरकारों बिहार, केरल एवं पश्चिम बंगाल द्वारा अपने- अपने राज्य में नए  डी.जी.पी.  की नियुक्ति अपने राज्य के प्रासंगिक कानून के अनुसार  एवं संघ लोक सेवा आयोग (यू.पी.एस.सी) को इस कवायद में शामिल किये बिना करने  सम्बन्धी सभी याचिकाएं ख़ारिज कर दी थी.  सुप्रीम कोर्ट ने इन  सभी राज्यों को कोर्ट द्वारा गत वर्ष 3 जुलाई 2018 को दिए गए निर्देशों का सख्ती से अनुपालना करने को कहा  है. लिखने योग्य है  कि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वह अपने राज्य का पुलिस प्रमुख (डी.जी.पी)  नियुक्त करने के लिए उपयुक्त आई.पी.एस. अधिकारियों के नाम  निश्चित समय से पहले यू.पी.एस.सी को भेजे जिनमे  से  आयोग इस नामो में से एक पैनल तैयार कर  वापिस सम्बंधित राज्य सरकार को भेजेगा एवं उस सरकार को अपने राज्य  के पुलिस प्रमुख की नियुक्ति यू.पी.एस.सी द्वारा उक्त बनाये गए एवं भेजे गए उसी पैनल में से ही करनी होगी. हालांकि गत वर्ष सितम्बर माह में पहले पंजाब एवं इसके पश्चात दिसंबर माह के अंत में हरियाणा ने अपने सम्बंधित  पुलिस कानूनों में संशोधन कर राज्य का डी.जी.पी. लगाने के प्रावधानों में बदलाव कर दिया एवं सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं डालकर इसी के अनुरूप अपने राज्य का डी.जी.पी नियुक्त करने की कार्यवाही करने एवं यू.पी.एस.सी को इस प्रक्रिया में शामिल न करने की गुहार की थी जिसे कोर्ट ने नामंजूर कर दिया. इसके बाद  पंजाब और हरियाणा ने  सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनुपालना में उपयुक्त आई.पी.एस. अधिकारियों के नाम यू.पी.एस.सी. को भेज दिए. पंजाब एवं हरियाणा दोनों राज्यों के डी.जी.पी. क्रमश: सुरेश अरोड़ा एवं बलजीत सिंह संधू, जिन दोनों की मूल सेवानिवृति गत वर्ष 30 सितम्बर को निर्धारित थी, को केंद्र सरकार द्वारा पहले तीन तीन महीने का अर्थात 31 दिसंबर तक का  एक्सटेंशन दे दिया  गया एवं इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गत दिसंबर में  31 जनवरी 2019  तक दोनों को अपने पदों में बने रहने का आदेश दिया. एडवोकेट हेमंत  ने कुछ दिन पहले  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन-शिकायत पोर्टल पर एक पत्र याचिका भेजकर उनसे अनुरोध किया कि उनकी सरकार को अपने द्वारा  कोआपरेटिव फेडरलिस्म ( सहकारी संघवाद ) के दिए गए सिद्धांत की अनुपालना करते हुए   राज्यों द्वारा अपने राज्य का  डी.जी.पी. लगाने में पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करने बाबत बाबत गंभीर विचार करना चाहिए. उन्होंने अपनी याचिका में अनुरोध किया है कि चूँकि भारतीय संविधान में ऐसा   कहीं नहीं लिखा है कि राज्य सरकारों द्वारा अपने प्रशासनिक तंत्र में किसी भी उच्च पद पर नियुक्ति या तैनाती करते समय संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श लिया जाएगा परन्तु चूँकि  सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार नामक पुलिस सुधारो पर दिए गए अपने निर्णय में ऐसे निर्देश दे दिए हैं और इन्हे बार बार दोहराया है, इसलिए  केंद्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद  320 (3 ) के परन्तुक का प्रयोग कर बनायीं गए  संघ लोक सेवा आयोग (परामर्श से छूट ) विनियमन, 1958  के तहत हर  राज्य के  डी.जी.पी. के चयन की  नियुक्ति प्रक्रिया को यू.पी.एस.सी के दायरे से बाहर रखने बाबत उचित कार्यवाही करने चाहिए एव सुप्रीम कोर्ट में भी एक अर्जी दायर कर कोर्ट को इस मामले में अवगत करवा कर कोर्ट के आदेशों में संशोधन करवाना  चाहिए. चूँकि  मोदी सरकार ने  अपनी कार्य-प्रणाली में कोआपरेटिव फेडरलिस्म (सहकारी संघवाद) का नारा दिया हुआ  है एवं क्योंकि  भारत, जो संविधान के अनुसार राज्यों का संघ है, अत: सभी केंद्र द्वारा सभी राज्य सरकारों को अपने अपने राज्य के पुलिस प्रमुख के पद पर चयन प्रक्रिया  में पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए.

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