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युवा की ही दरकार - रोजगार की पुकार

January 31, 2019 02:58 PM

रोजगार परिदृश्य देश में भयावह तस्वीर दिखा रहा है । युवा भारत में साक्षर निरक्षर, शिक्षित, प्रशिक्षित-युवक युवतियां रोजगार के लिए हताश देखे जा सकते हैं । हाल ही में हरियाणा में ग्रुप डी - अर्थात चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के लिए ग्रेजूएट, पोस्ट ग्रेजुएट यहां तक कि पीएचडी वालों ने भी काम करने की इच्छा जताई । रोजगार के क्षेत्र में असमानता इतनी बढ़ गयी है कि दो छोर, सफेद व काला, इतने स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं । एक तरफ इंजीनियरिंग व प्रबन्ध के शीर्षस्थ संस्थानों से पास आउट जैसे कि आई आई टीज व आई आई एमस से निकलने वाले 22-24 वर्ष के छात्रों को लाखों करोड़ों का शुरूआती वेतन मिल रहा है तथा उन्हें बड़ी-बड़ी नामी-गिरामी कम्पनियों जैसे कि गूगल, फेसबुक, आई बी एम, बड़े बड़े विदेशी बैंकस, सुपर बाजार श्रंखलाएं, हाथों हाथों लेने को तैयार हैं, वहीं पूरे देश में फैले असंख्य बिजनेस स्कूलों से पास आउट तथा इंजीनियरिंग ग्रेजुएटस को, हाजारों लाखों रूपये खर्च करके एक अदद नौकरी, जिसमें सम्मानीय व उचित वेतन हो, उपलब्ध नहीं है । आई टी सैक्टर का आक्षेप है कि इन इंजीनियरिंग कालेजों से निकले छात्रों में से 90 प्रतिशत छात्र रोजगार योग्य ही नहीं है । ए आई सी टी ई, जो इ संस्थाओं की नियामक संस्था है उसने इस आरोप का खंडन किया है तथा इस बात पर जोर दिया है कि आई टी उद्योग को नये पाठयक्रम को आवश्यकता अनुरूप् बनाये जाने की सहयोग करना चाहिए तथा उद्योग को फ्रेश इंजीनियरिंग ग्रेजुएटस के लिए प्रशिक्षित करने की व्यवस्था भी करनी चाहिए । बिजनेस स्कूलों, जो कि एम बी ए तथा इंजीनियरिंग संस्थाए जो इंजीनियरिंग की शिक्षा देती है उन्हें वर्तमान समय की चुनौती स्वीकारते हुए अपने पाठयक्रमों तथा अपनी विचारधारा में परिवर्तन करना चाहिए । किसी जमाने में एम बी ए व इंजीनियरिंग की पढाई, एक अच्छे रोजगार व उससे मिलने वाली बेहतरीन तन्खवाह व भत्ते की गारंटी तथा सुरिक्षत कैरियर मानी जाती थी । पर आज न केवल ये शिक्षा व डिंिग्रयां महंगी हो गयी है अपितु बाजार में उनका अवमूल्यन भी हुआ है । स्वरोजगार जैसे कि मोदी जी ने पकोड़े तलने के व्यवसाय की बात की थी क्योंकि चाय बनाने के व्यवसाय में विस्तार इसी से मिलता है पर आज के शिक्षित ग्रेजुएट को तो ये काम भी कुशलता से नहीं आता । सरकार जो कभी माडल नियोक्ता होती थी अब सारी सरकारी भर्तियां आउट सोर्ससिंग से ही रही हैं जिनमें न कोई स्थयित्व है न आगे बढने के अवसर, न भविष्य के लिए ग्रेच्यूटी, पैंशन वे दूसरे भत्ते एकमुश्त राशि जिसमें न ग्रेडस हैं न अन्य प्रावद्यान । अभी अभी यू जी सी की नई नियमावली आई है जिसमें उंच्ी शिक्षा प्राप्त छात्रों को भी गैस्ट फैक्लटी लगाने के लिए नियुक्त व आवश्यक योग्यता की शर्तें तो वहीं रहेगी जो एक असिसटेंट प्रोफेसर की होती है पर उसे पूरा वर्कलोड भी लेना होगा, लेकिन उसे 1500 रूप्ये प्रति लैक्चएर तथा अधिकतम 50000 रूप्ये महीन मिलेगा उसे कोई अन्य भत्ता, पैंशन, ग्रेच्यूटी तथा छुट्टियां नहीं प्राप्त हांेगी । हालांकि यू जी सी ने वर्तमान स्तर को लगभग डबल 25000 रूप्ये से बढाकर 50000 रूपनये किया हैं, पर लगने वाले कर्मचारी की दृष्टि से कैरियर व रोजगार के अवसर के रूप् में देखा जाए तो न स्थायत्वि है न सुरक्षा ये तो विश्वविद्यालयों तथा सरकार महाविद्यालय जोकि संगठित क्षेत्र में आते हैं वहां पर लागू होगी निजी क्षेत्र की हायर एजुकेशन की संस्थाएं, जो कुक्कर मुत्ते की तरह चारो तरफ फैली है मोटी फीस छात्रों से लेती हैं उसे लागू करेगी भी या नहीं, देखना बाकी है । जिस देश में 65 प्रतिशत से ज्यादा लोग 35 वर्ष से कम आयु के हैं, ऐसे युवा देश में रोजगार की समस्या नम्बर एक समस्या है, इसे अवसर तथा चुनौती दोनों के रूप् में भी देखा जा सकता है । संत राम मंदिर बनाने का एलान करे या सरकारे व राजनेता़ ़ऋणमाफी व अन्य मुददे उछाले, आर्थिक, समाजिक व राजनैतिक परिवेश से केवल एक ही मांग हैं कि रोजगार के अवसर बढाये जाएं । अंत में गौतम राज़ऋषि की ये पंक्तियां ’’ कितने हाथों में यहां है कितने पत्थर गौर कर । फिर भी उठ उठ कर आ गये है कितने ही सर, गौर कर आसमां तक जो चढा सैंसक्स अपने देश का चीथडे़ है फिर बचपन के बदन पर, गौर कर । यार जब जब घूम आते है विदेशों में मगर, अपनी तो बस कवायद है घर से दफतर तक गौर कर । उनके ही हाथों से देखों बिक रहा है हिंदोस्तां, जिन्होंने डाल रखे तन पे खदद्र गौर कर ।

                                                      डा0 क0 कली

 
 
 
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