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National

कुशल नेतृत्व के लिए वाजिब सवाल

January 30, 2019 03:53 PM

नेता, चाहे किसी भी क्षेत्र में हो, चाहे राजनैतिक, समाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व धार्मिक, उसे उसके विजन, विचार प्रक्रिया व कार्यशैली पर आंका जाना चाहिए । लेकिन हम एक ऐसे युग में जी रहे है, जहा नेतृत्व को विशेषकर राजनीति के क्षेत्र में, उसकी लोकप्रिय छवि के आधार पर आंका जा रहा है । निसंदेह लोकतंत्र में 9 घोड़े 10 गधों पर हावी रहते हैं क्योंकि इसमें केवल संख्यात्मक पक्ष को महत्व दिया जाता है, गुणात्मक पक्ष को नहीं । इसलिए ही प्लेटो प्रजातंत्र को मात्र भीड़तंत्र-मोबोक्रेसी मानते थे । कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रियंका के अधिकारिक राजनैतिक प्रवेश की घोषणा का मुद्दा ही ले लीजिए । कोई उनसे उनकी नेतृत्व क्षमता से संबंधित सवाल, वर्तमान समय की जटिल समस्याओं के निदान की सटृैटजी के बारे में नहीं पूछ रहा ।एक तरफ भाजपा के नेता उन पर निजी जीवन पर टीका टिप्पणी कर रहे हैं तथा कांग्रेस पर वहीं पुराना वंशवाद का आरोप लगाये जा रहे हैं । अमित शाह ने तो इसे वन रैंक वन पैंशन ओ आर ओ पी का नया नाम ’’ ओनली राहूल, ओनली प्रियंका’’ की कांग्रेस बताया है । खैर इसका जवाब पलटवार करते हुए कांग्रेस ने भी भाजपा को ओ एम ओ एस - अर्थात ओनली मोदी ओनली शाह की पार्टी बताया है । एक तरफ भाजपा यह भूमिका बना रही है कि प्रियंका की राजनैतिक एंटृी को वह महत्व नहीं देती, पर दूसरी तरफ उनके नेता प्रियंका गांधी पर निजी हमले कर सुर्खियां बटोर रहे हैं । कोई उन्हें ’’ चाकलेटी चेहरा बता रहा है तो किसी को उनमें खूबसूरती के इलावा कुछ गुण नहीं है, ऐसा बता रही है । सुब्रहमण्यम स्वामी को उसमें हिंसात्मक चरित्र दिखता है, ये निजी आक्षेप राजनीति में निरंतर घटते विमर्श तथा क्षुद्र सोच के परिचायक है । मुद्दा संकुचित सोच का है । नारी की गरिमा, राजनीति में तो, आज भी दांव पर हैं । नेतृत्व की कसौटी-केवल बाहरी संदरता से नहीं आंकी जानी चाहिए । वहीं उसे केवल शब्द जाल, जुमले व बयानबाजी से भी नहीं आंकी जानी चाहिए । सुर्खिया बटोरने व भीड़ इकटठी करने में - संवाद शैली तथा उपरी दिखने वाला व्यक्तित्व दोनों ही नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर नेतृत्व का चमत्कारी होना क्रिसमेटिक आखिरकार उसके स्टाईल, चिंतन तथा चरित्र पर निर्भर करता है । जुबान तो हमारे नेताओं की इतनी फिसलती है कि सास-बहू, ननद-भोजाई, देवरानी-जैठानी के वार पलटवार को भी शर्मिंदा कर दे । नेताओं का चिंतन स्तर क्या हैं । उनके चरित्र में गुण व क्षमता क्या है । ये आज कोई नहीं पूछता । सत्यमेवजयते कहने वाले देश में सत्यता व बापू के देश में अहिंसा के प्रति आग्रह-हिंसा को रूकवाने के लिए आमरण व्रत रख लेना - वो सत्य व अहिंसा आचरण में कहां है । ऐसे नेतरा जो समाज में अग्रणीय होते थे क्योंकि वो गंूगों की जुबान, अंधों की लकड़ी, बेसहारों के सहारा होते थे, वों कहां है । सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के देश में एक प्रतिशत धनाड्य लोग 78 प्रतिशत धन सम्पदा पर काबिज है तथा जहां कुछ खरबपति करोड़ों गरीबों पर अपनी धाक जमाये हुए है ये हालात और बद से बदत्तर होंगे, जब तक नेतृत्व से हम सही व कड़क प्रश्न नहीं पूछते । कहते हैं कि ’’ नाट गोलड बट पीपल मेक ए नेशन ग्रेट एण्ड स्टृांग ’’ अर्थात लोग नेताओं को बनाते हैं, नेता संस्थाएं बनाते हैंतथा संस्थाओं से देश व राष्टृ बनता है । लीक से हटकर चलना,नया पथ बनाना, न केवल स्वंय,बल्कि सब को मंजिल की ओर चलने की प्ररेणा देना, ये सब करने की कुशल नेतृत्व से आशा की जाती है, की जानी चाहिए नही ंतो सत्ता को प्राप्त कर, उसका सुख भोग उससे चिपके रहना केवल नेतृत्व के लिए अभिशाप है । अंत में मुक्तिबोध के यह शब्द ’’ कोशिश कर कुछ ऐसा कहने की जिससे क्षितिज हो सके और अधिक विस्तृत, जिससे ह्दय हो सके और अधिक आलोकित ’’

डा0 क0 कली

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