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कृषि व्यवसाय में अपरिहार्य सुधार

January 21, 2019 05:31 PM

जय किसान के देश में किसान की दुर्दशा कोई नयी बात नहीं हैं । जब से जीवन निर्वाह खेती का व्यापारीकरण अर्थात खेती को बाजारों से जोड़ा गया है । आम किसान की हाल बद से बदतर हुई है । यही हाल स्वतंत्रता से पहले था, स्वतंत्रता के बाद भी यहीं हालात बने हुए हैं । बाजार से जोड़ना ही कृषि के उद्धार का प्रथम व अन्तिम उपाय है । पर उसे बाजारी ताकतों के सहारे अकेला नहीं छोड़ा जा सकता, बाजारीकरण के साथ साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि कैसे कृषक बाजार में अपने उत्पाद की सही कीमत प्राप्त कर सकता है । कृषि देश में सबसे बड़ा रोजगार का क्षेत्र है, आम व्यक्ति के लिए आजीविका का साधन है पर खेती सबसे निम्नतम तथा घाटे वाला उघम बनता जा रहा है । देश की बढ़ती जनसंख्या को अन्न उपलब्ध करवाने वाल अन्नदाता आत्महत्याएं करें, इससे बड़ी विकट स्थिति किसी देश में क्या हो सकती है । राजनीति के चलते लोकतंत्र में कृषकों के संगठन तथा उनके नेता कृषि की स्थिति सुधारने के लिए इससे जुड़े मुद्दे उठाते रहते हैं पर वोट बैंक की राजनीति ज्यादा होती है , कृषि की समस्याओं का व्यवहारिक निवारण तथा उनके निदान पर कम ध्यान होता है । हर सरकार अपने नये नारों के साथ जैसे कि वर्तमान सरकार ने ’’जय जवान जय किसान’’ में ’’ जय विज्ञान तथा जय अनुसंधान’’ को जोड़ नयी बोतलों में पुरानी शराब अर्थात समस्या पुरानी, हल पुराने, केवल लालीपाप समाधान की तरफ बड़ रही है । किसानों की आय बढ़ाने के लिए यूनिवर्सल बेसिक न्यूनतम आय के प्रावधान के बारे में सोचा जा रहा है । फिर समस्या आती है कि पैसा कहां से आयेगा। वित्तीय घाटा बढ़ जाएगा । उसका बड़ा सुंदर उत्तर कृषि विशेषज्ञ देविन्द्र शर्मा जी देते है कि ’’ किसानों के लिए पैसा उसी स्त्रोत से आयेगा, जहां से सांतवे वेतन आयोग के बजटीय आवंटन से आता है । जहां से कारपोरेट छूट के लिए आता है और जहां से बड़े पैमाने पर बैंक एनपीए को बटटे खाते में डालने के लिए आता है । कृषि, देश की अर्धव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी बने तथा मजबूत बने, इसके लिए कारगर उपाय करने जरूरी है । कृषि की वर्तमान दुदर्शा के लिए भूतकाल की नीतियों की दुहाई देते रहना तथा सरकारों का एक दूसरे पर आक्षेप करते रहना कि उन्होंने किसानों के लिए कुछ नहीं किया हम उनके मसीहा है, हमने उनके फायदे के लिए ये किया, वोकिया, पर परिणाम क्या है । आयोग बैठाये जाते है, विशेषज्ञों की रिपोटर्स धूल चाटती रहती है, होता कुछ भी नहीं है । बहुचर्चित स्वामीनाथन की रिपोर्ट में 200 से अधिक सुझाव दिये गये थे पर सरकारे उन्हें अमली जामा पहनाने से बचती रही हैं । कृषि नीतियों को जोर दोनो उत्पादन बढ़ाने तथा किसान को उसका पूरा प्रतिफल मिले अर्थात किसान की आये बढ़ाने पर भी होना चाहिए । कृषि व कृषक दोंनो को एक साथ एक यूनिट के तौर पर देखा जाना चाहिए । लेकिन कम उपज के चलते भी मार किसान पर पड़ती है, उत्पादन ज्यादा होने पर उचित कीमत के न मिलने से उसकी लागत भी नहीं निकल पाती । कृषि उत्पादकता तथा कृषक की कुशलता दोनों को बाजार में उचित प्रतिफल मिलना चाहिए । युवाओं को कृषि से विमुख होने से रोकना जरूरी है । कृषि के साथ उपज तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग गांवों में लगाकर न केवल गांवों से शहरों का पलायन रूकेगा, अपितु वहीं रोजगार उपलब्घ करवा, जीवन स्तर में सुद्यार हो सकेगा । कृषि का व्यवसायीकरण तथा कमर्शियलाइजेशन बड़े किसानों तथा बड़े व्यापारियों के लिए तो फायदेमंद सिद्ध हुआ है पर खेतिहर किसान व कृषि मजदूर व सीमान्त किसानों के हितों की रक्षा करना अत्यंत अनिवार्य है । स्थानीय स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक कदम उठानें जरूरी है । ग्रामीण महिलाओं के लिए भी कृषि को लाभपूर्ण पेशा बनाया जाना जरूरी है । बेसिक शिक्षा के साथ साथ कृषि संबंधी सूचनाओं तथा तकनीकी ज्ञान की भी व्यवस्था ग्रामीण तथा आंचलिक स्तर पर की जानी चाहिए । अन्यथा बढ़ती सामाजिक विषमता तथा आर्थिक विपन्नता जो किसानों को आत्महत्याओं की तरफ ले जा रहा है, भूखमरी को जन्म दे रही है, हिंसा तथा आक्रोष को बढ़ावा देकर नये संकट पैदा कर सकती है । अन्त में शिवमंगल सिंह सुमन की ये पंक्तियां:

’’ घर आंगन में आग लग रही ।
स्ुलगा रहे वन उपवन, दर दीवारे चटख रही हैं
जलते छप्पर छाजन । जन जलता है, मन जलता है
जलता जनद्यन जीवन, एक नहीं जलते सदियों से जकड़े गर्हित बंद्यन’’


                          डा0 क0 कली

 
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