Thursday, June 27, 2019
Follow us on
BREAKING NEWS
हरियाणा में हर रोज हो रहे हैं तीन हत्याएं, पांच दुष्कर्म और दस अपहरण : सुरजेवालाICC क्रिकेट वर्ल्ड कप:भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला कियाहरियाणा विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार को उतारेगी स्वराज इंडिया:राजीव गोदाराप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट करके कहा है कि भारत को अमेरिका पर लगाए गए टैरिफ वापस लेने होंगेHaryana Govt nominates Krishan Lal of village Baniyani as a non-official member of the District Grievances Readdressal Committee. Rohtakस्विट्जरलैंड में नीरव मोदी और पूर्वी मोदी के चार बैंक खाते सीजMG Hector SUV हुई भारत में लॉन्च, TATA Harrier से सस्तीश्रीनगर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता अब्दुल रहीम राथर के ठिकानों पर IT की छापेमारी
Editorial

NBT EDIT JAN 12-नेताओं का चरित्र-चित्रण जोखिम भरा काम सियासी फिल्मों का टोटा

January 12, 2019 05:32 AM

COURTESY NBT EDIT JAN 12

नेताओं का चरित्र-चित्रण जोखिम भरा काम
सियासी फिल्मों का टोटा

 

‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’
विजय रत्नाकर गुट्टे के निर्देशन में बनी फिल्म ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ भले ही कुछ वास्तविक राजनीतिक संदर्भों को लेकर चर्चा में हो, लेकिन दर्शकों को यह कुछ खास प्रभावित नहीं कर पाई है। जैसा कि अंदेशा था, फिल्मकार का मकसद फिल्म बनाने से ज्यादा एक सियासी प्रचार को स्थापित करने का है। फिल्म इसी शीर्षक वाली संजय बारू की किताब पर आधारित है। पत्रकार संजय बारू पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके हैं। फिल्म दिखाती है कि पीएम के रूप में मनमोहन सिंह किस कदर लाचार थे और सारे अहम फैसले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके इर्द-गिर्द के लोग लिया करते थे। किताब की मूल प्रस्थापना में भी यह बात शामिल है, लेकिन फिल्म में इसे कुछ ज्यादा ही खींच दिया गया है। इस प्रस्थापना का राजनीतिक लाभ एक खास धारा द्वारा ही उठाया गया है, जो अभी सत्ता में है। लिहाजा एकबारगी संदेह होता है कि कहीं यह फिल्म सत्ता पक्ष को संतुष्ट करने के लिए ही तो नहीं बनाई गई। फिल्म अगर सिनेमा के मानदंडों पर खरी उतरती तो सारे संदेहों के बावजूद इसे सराहना मिलती। पर दु्र्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका। जो भी हो, इस फिल्म से भारत में राजनीतिक सिनेमा की संभावनाओं और कठिनाइयों पर एक बहस तो छिड़ ही गई है। इधर बॉलिवुड में बायोपिक का चलन बढ़ा है। कई खिलाड़ियों, फिल्म सितारों, बड़े कारोबारियों और अपराधियों के जीवन पर फिल्में बनीं और हिट भी हुईं। इससे एक बात तो साबित हो चुकी है कि हमारा दर्शक वर्ग अब परिपक्व हो चला है। अपने बीच के किसी व्यक्ति का जीवन-संघर्ष उसे पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचते हीरो-हिरोइनों के इर्दगिर्द बुनी परीकथाओं से ज्यादा आकृष्ट कर रहा है। ऐसे में एक राजनेता के जीवन को करीब से देखना भी उसे अच्छा लगेगा, बशर्ते यह अपने समूचे राग-विराग के साथ उपस्थित हो, केवल निंदा या प्रशंसा की सपाट कूची से इसे न रचा गया हो। यह सचमुच दुखद है कि राजनीतिक फिल्मों का अकाल हमारे यहां शुरू से ही दिखता है। जो दो-चार फिल्में बनी हैं उनमें सबसे ज्यादा चर्चा 1975 में गुलजार के निर्देशन में आई ‘आंधी’ की होती है। लेकिन वह इंदिरा गांधी की बायोपिक नहीं, उनके जीवन की परछाईं भर है। दरअसल राजनेताओं के जीवन को केंद्र में रखकर फिल्म बनाना खुद में एक बड़ा जोखिम है। भारतीय जनतंत्र अभी इतना उदार नहीं हुआ है कि राजनेताओं की आलोचना को सहजता से ले। हर नेता किसी न किसी समुदाय का नायक है। अपने समूह के भीतर उसकी एक ईश्वरीय छवि है, जो उसके जेल चले जाने पर भी अक्षुण्ण रहती है, लेकिन सिनेमा के पर्दे पर जरा भी दाएं-बाएं होते ही दरकने लगती है। बहरहाल, यह तो आगे की बात है। अभी तो सबसे बड़ी जरूरत एक अदद ऐसी दिलचस्प किताब या स्क्रिप्ट की है, जिसका मकसद राजनीति को करीब से देखना हो, किसी खास धड़े की राजनीति का चारा बनना नहीं।

 

Have something to say? Post your comment