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हरियाणा में डी.सी. द्वारा कलेक्टर रेट निर्धारण को कानूनी मान्यता देने सम्बन्धी आज तक कोई नियम नहीं

December 08, 2018 05:43 PM

चंडीगढ़ –हरियाणा प्रदेश के जिला प्रशासन अर्थात हर जिले के डी.सी.  द्वारा वार्षिक आधार पर  अपने अपने  जिले के लिए प्रस्तावित कलेक्टर रेटो की सूची  सार्वजानिक की जाती है एवं यह बताया जाता है कि यदि किसी व्यक्ति को इन रेटो पर कोई आपत्ति है तो इस बाबत वह अपना आक्षेप या सुझाव दर्ज करवा सकता  है जिसके बाद इन रेटो को फाइनल अधिसूचित कर दिया जाता है।लिखने योग्य है कि यद्पि ये कलेक्टर रेट निर्धारण एक वर्ष के लिए होता है हालाकि पिछले वर्ष  हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने घोषणा की थी कि जल्द ही राज्य में कलेक्टर रेट हर छह माह बाद अर्थात वर्ष में दो बार संशोधत किये  जायेगे परन्तु अब तक ऐसा नहीं किया गया है।  बहरहाल, इसी बीच पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया  कि वो आज तक इस  बाबत अपने स्तर पर पूर्ण  जानकारी नहीं हासिल कर पाए  कि हरियाणा जिले का हर डी.सी., जो  कलेक्टर के तौर पर भी कार्य करता है,  एवं जो हर वर्ष अपने सम्बंधित जिले के कलेक्टर रेट निर्धारित एवं अधिसूचित करता है, वो ऐसा वो किस नियम  अथवा राज्य सरकार द्वारा ज़ारी किन आदेशो के तहत करता है तथा इस प्रक्रिया के लिए क्या कोई दिशा-निर्देश वर्णित है अथवा नहीं ?   इसमें कोई दोराये नहीं कि जिले के डी.सी. को सम्बंधित अधिनियमों जैसे कि भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 के अंतर्गत जिला के कलेक्टर के रूप में पर्याप्त   शक्तिया प्राप्त है परन्तु  जिले में  कलेक्टर रेट निर्धारित बाबत प्रावधान का सन्दर्भ उक्त उल्लेखित अधिनियम के अनुसरण में सम्बंधित नियमों अथवा उपनियमो में अवश्य होना चाहिए। हेमंत ने कहा कि जहाँ तक पडोसी राज्य पंजाब का प्रश्न है तो वहां  दिसम्बर,  1983 में पंजाब स्टाम्प ( कम-मुल्यांकन दस्तावेज सम्बंधित) नियम बनाये जिन्हें अगस्त, 2002 में संशोधित कर सम्बंधित जिले में कलेक्टर द्वारा  अपने जिले में स्थित भूमि/संपत्ति के न्युनीतम मूल्य निर्धारित करने बाबत प्रक्रिया का उल्लेख है।इसमें यह भी वर्णित है कि जिला कलेक्टर ऐसा  निर्धारण  विशेषज्ञों की समिति, जिसमे जिले के विभिन्न विभागों के अधिकारी होंगे, के साथ सलाह-मशवरा करने के उपरान्त ही करेगा। अब प्रश्न ये उठता है की क्या यह पंजाब का यह नियम हरियाणा पर भी स्वत: लागू होगा ?  इसका उत्तर में हेमंत का कहना है की ऐसा  नही हो सकता क्योंकि पंजाब द्वारा  उक्त कलेक्टर रेट निर्धारण बाबत नियम हरियाणा राज्य के गठन के पश्चात् बनाया गया है अते ये हरियाणा में स्वत: लागू नहीं होता. हालाकि हरियाणा सरकार ने भी वर्ष नवम्बर,1978 में हरियाणा स्टाम्प (कम-मुल्यांकन दस्तावेज निवारण) नियम बनाये थे परन्तु आज उनमे जैसा पंजाब सरकार द्वारा वर्ष  2002 में कलेक्टर रेट निर्धारण नियम डाला गया था वैसा  हरियाणा ने आज तक ऐसा नहीं किया. इस बारे में उन्होंने एक  आर.टी.आई. याचिका इस वर्ष  मार्च माह में  चंडीगढ़ स्थित हरियाणा सचिवालय  के राजस्व विभाग में अंडर सेक्रेटरी जो सम्बंधित शाखा के जन सूचना अधिकारी भी है के समक्ष दायर की जिसके जवाब में उन्हें जो  दस्तावेज भेजे गए उनमे डी.सी. द्वारा कलेक्टर रेट निर्धारण करने सम्बन्धी  कोई नियम का उल्लेख नहीं है।अत: यह कहा जा सकता है कि आज हरियाणा का  हर डी.सी अपने जिले के कलेक्टर की भूमिका निभाते हुए जब वार्षिक कलेक्टर रेट निर्धारित एवं अधिसूचित करता है, तो उसकी कोई वैधानिक (कानूनी) मान्यता नहीं है। बहरहाल इस सम्बन्ध में एडवोकेट हेमंत ने इस आर.टी.आई. के जवाब मिलने के बाद  तत्काल रूप से  हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल महोदय, मुख्यमंत्री हरियाणा, राजस्व मंत्री, राजस्व विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव आदि को ईमेल मार्फ़त पत्र-याचिकाएं  भेजकर अपील की कि पंजाब के उपरोक्त वर्णित नियम का हरियाणा शीघ्र अनुसरण करे ताकि कलेक्टर रेट निर्धारण को वैधानिक स्वीकृति प्राप्त हो सके परन्तु आज तक न इस सम्बन्ध में न तो उन्हें कोई  जवाब प्राप्त हुआ न ही आज तक हरियाणा सरकार द्वारा ऐसा नियम बनाया गया है जो कि अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

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