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हरियाणा सरकार द्वारा जारी सरकारी विज्ञापन में डॉ. बी.आर.अम्बेडकर के नाम के समक्ष “भारत रत्न” प्रयुक्त करना सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की अवमानना नहीं

November 26, 2018 02:44 PM

चंडीगढ़(रमेश शर्मा): हरियाणा सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग द्वारा जारी सरकारी विज्ञापन में डॉ. बी.आर.अम्बेडकर के नाम के समक्ष “भारत रत्न” प्रयुक्त करना सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की अवमानना नहीं। यह जानकारी देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने इस बारे में बताया कि आज 26  नवम्बर के दिन को तीन वर्ष पहले 2015  में केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार ने भारतीय संविधान के निर्माण में विशेष भूमिका निभाने वाले एवं तत्कालीन संवेधानिक सभा की प्रारूपण समिति के अध्यक्ष के तौर पर अपना अमूल्य योगदान के लिए डॉ. भीम राव अम्बेडकर को उनके जन्म की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर  इस  दिन को प्रतिवर्ष “संविधान दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। अब इस दिन केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों के और से इस बाबत मीडिया में विज्ञापन प्रकाशित करवाए जाते हैं। इसी के चलते हरियाणा सूचना एवं जन संपर्क विभाग हरियाणा द्वारा आज विभिन्न समाचार पत्रों में इस सम्बन्ध में विज्ञापन प्रकाशित हुआ जिसमे डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के नाम के समक्ष “भारत रत्न” प्रयुक्त कर दिया गया है जिसे लेकर एक बवाल सा मच गया है की यह सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 1995 के एक  निर्णय का उलंघन है एवं इससे कोर्ट की अवमानना हुई है। एडवोकेट हेमंत कुमार ने इस बारे में बताया कि यह ठीक है कि आज से 23  वर्ष पूर्व 15  दिसम्बर 1995 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के एक संवेधानिक बेंच ने “बालाजी राघवन बनाम भारत सरकार” नामक केस में यह निर्णय दिया था कि भारत सरकार द्वारा प्रदान किये जाने वाले चार राष्ट्रीय अवार्ड अर्थात भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण एवं पद्मश्री को किसी भी प्रकार से नाम से साथ  उपाधि के तौर पर प्रयोग नहीं किया जा सकता है।इसे प्राप्त करने वाला व्यक्ति इन्हें अपने नाम के आगे या पीछे नहीं लगाएगा। अगर वो ऐसा करता है, तो एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए उस व्यक्ति को प्रदान किया गया प्रासंगिक राष्ट्रीय अवार्ड को भारत सरकार द्वारा जब्त किया जा सकता है।एडवोकेट हेमंत ने बताया की यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि  सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्देश राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित व्यक्ति पर लागू होता है कि वो स्वयं उक्त अवार्ड को अपने नाम के  के आगे या पीछे नहीं लगाएगा ताकि वह किसी प्रकार की कोई उपाधि लगे. अगर केंद्र या राज्य सरकार द्वारा जारी किसी सरकारी विज्ञापन में  और यहाँ तक कि जनसाधारण द्वारा सम्बंधित राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित व्यक्ति को उनके नाम के साथ यह सम्मान लगाकर  संबोधित किया जाता है, तो इससे  कानूनी एवं तकनीकी रूप  किसी प्रकार से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की अवमानना नहीं होगी क्योंकि इस बाबत कोर्ट ने उन सब पर कोई स्पष्ट प्रतिबन्ध नहीं लगाया। हालाकि एडवोकेट हेमंत का व्यक्तिगत तौर पर मत है कि सम्बंधित केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा प्रकाशित सरकारी विज्ञापनों में भी अगर राष्ट्रीय अवार्ड  पाने वाली विभूतियों के नाम के साथ ऐसा उल्लेख न किया जाए, तो यह अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि इससे अनावश्यक विवाद से बचा जा सकता है।

 
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