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निजी क्षेत्र का बढ़ता वर्चस्व

October 03, 2018 04:05 PM

बाजारवादी अर्थव्यवस्था, मार्किट इकोनामी आज हर क्षेत्र में, चाहे वे शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी समाजिक वस्तुंए हों या फिर मनोरंजन का क्षेत्र हो, सब जगह निजी क्षेत्र अपना आद्यिपात्य जमा रहा है । बाजार की शक्तिंया, कीमतें,मांग व पूर्ति साधनों का इष्टतम बंटवारा करती है । हमारे देष में भी निजी क्षेत्र पूरे जोर-शोर से आगे बढ़ रहा है लेकिन इस प्रकार की व्यवस्था में ‘‘उपभोक्ता ही सम्राट है‘‘ जिस मूलधारणा पर यह टिकी होती है, वह हमारे यहां नदारद है । इसीलिए ही उपभोक्ता का शोषण जारी है, न तो उसको सुविधाएं व श्रेष्ठ क्वालिटी की वस्तुए मिलती है तथा कीमत की अत्याघिक देनी पड़ती है । निजी क्षेत्र में लाभ ही प्ररेणास्त्रोत होता है, पर दीर्घकाल में तो अगर उपभोक्ता-ग्राहक संतुष्ट होगा तभी लाभ कमाया जा सकेगा, अन्यथा व्यवसाय का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा । ग्राहर ही सर्वेसर्वा या ‘‘ग्राहक पहले, लाभ बाद में ’’ निजी क्षेत्र के विस्तार व विकास का मूलमंत्र होता है, पर हमारे देश में निजी क्षेत्र के उद्योगपति न तो उपभोक्ता के लिए उदार नीतियां अपनाते है और न ही कर्मचारी/श्रमिकों के लिए । उनका सारा ध्यान अपने लाभ व निजी धन को बढ़ाने पर केंद्रित है । अब चाहे आप हैल्थ सैक्टर में बढ़ते निजी-क्लीनिकों या बड़े बड़े कारपोरेट हस्पतालों को ले लो उनमें कार्यरत डाक्टरों पर टारगेट पूरे करने का प्रैशर है तथा रोगी, पेशंटस का बेइन्ताह शोषण जारी है । ह्रदयरोग से पीड़ित व्यक्ति की समस्या का निदान उनकी प्रमुखता नहीं, कितने वाल्व ब्लाक हैं तथा कितने स्टंट डालने हैं उनकी सारी चिकित्सा झूठे-सच्चे टैस्ट करवा कर फंसे मुर्गे से जितना निकाला जा सके, भारी भरकम बिल बना अपना हित साधना है । अर्थात लगी पूंजी पर लाभ लेना है । लाभ तो लेना ही चाहिए पर प्रष्न विभिन्न स्टेकहोल्डर्स की प्राथमिकता का है । कस्टमर तो सबसे अन्तिम पायदान पर खड़ा हे । उसे न्यूनतम दर पर श्रेष्ठतम सर्विस व प्रोडक्ट उपलब्ध करवाना उनकी प्राथमिकता नहीं है । यह हाल निजी क्षेत्र का शिक्षा जैसे अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी देखा जा सकता है । मनमानी, भारी-भरकम फीसे लेकर भी जो शिक्षा, तकनीकी हो या सामान्य, न ही विद्यार्थी को रोजगार योग्य बनाती है, न ही उसके सहज गुणों व क्षमता का दोहन कर विकास कर रही है । गली के बीमार कुत्ते जैसे स्थिति हो चुकी है, ठोकर तो हर कोई लगा रहा है, पर उसकी तीमारदारी पर किसी को ध्यान नहीं है । अमेरिका व यूरोपियन देशों की तर्ज पर निजी क्षेत्र को बढ़ावा तो दिया जा रहा है? पर वहां पर जो सिद्धान्त व असूल, जोकि उनकी सफलता का मुख्य आधार हैं उन्हें हमारे देश में नजरअंदाज किया जा रहा है । वहां के उदारमना उद्योगपति जिन्होंने बड़ी बड़ी नामी-गिरामी संस्थाएं खड़ी की है और व्यवसायी उनके पीछे ग्राहक व उपभोक्ता को प्रमुखता देना, यह प्राथमिता रही है । लेकिन हमारे देश में तो यदि अधपका अंडा बिकता है, तोउस अंडे को पूरा क्यों पकाया जाए, वाली मनोवृत्ति हावी है । अपनी जेबे भरने में माहिर निजी क्षेत्र, बाजार व्यवस्था के मूलभूत सिद्धान्तों को अवहेलना कर, ज्यादा देर व दूर तक नहीं चल सकता । प्रगतिशील व उदार निजी क्षेत्र, जिसमें पूंजीपति अपने लाभ से पहले कार्यरत कर्मचारियों व ग्राहकों के हितों को महत्व देता है, वहीं बाजारवादी अर्थव्यवस्था को मानवीय चेहरा देकर, अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकता है ।

                                   डा0 क कली

 
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