Monday, December 10, 2018
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National

ऋण माफी व बैकिंग व्यवस्था

September 11, 2018 04:11 PM

राजस्थान सरकार का कल के मुख्य अखबारों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिखा जिसमें एक किसान हंसते हुए दिखाया गया जो खुशी व्यक्त कर रहा है कि ‘‘सरकार ने दिलाया कर्ज़ से छुटकारा’’, मैं ऋणमुक्त हो गया हूं, मेरा 50,000 रुपये का कर्ज़, जो मैंने सहकारी बैंक से लिया था, उसे देने में असमर्थ था, सरकार ने माफ कर दिया, हमें बड़ा सहारा मिला तथा मेरे बच्चों को बड़ी राहत मिली है’’, कुछ इस आशय को प्रकट करता विज्ञापन सोचने को बहुत कुछ मज़बूर करता है। सरकार किसानों के ऋणमाफी को चुनावी प्रलोभन के तौर पर खुल्लम-खुला प्रयोग कर रही है। पहले से जर्ज़र बैकिंग व्यवस्था को कैसे राजनैतिक हित साधने के लिये प्रयोग किया जा रहा है तथा खोखला किया जा रहा है, इसका यह ताजा उदाहरण है। छोटे व सीमान्त किसानों की सहायता सरकार को करनी चाहिये, पर प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि उनको बैंकिंग क्षेत्र से ऋण मिलता भी है या नहीं। बड़े या मध्यम वर्गीय किसान ही बैंकिग व्यवस्था से ऋण ले पाते हैं, छोटे व जरूरतमन्द किसान या मजदूर आज भी साहूकार महाजन व आढ़तियों पर क्रेडिट/साख के लिये निर्भर हैं। बैंक जो एन.पी.ए. की समस्या से जूझ रहे हैं, उनके ऋण वापिस नहीं आ रहे हैं, इसका मूल कारण हमारा दृष्टिकोण तथा व्यवस्थागत खामियां हैं। रसूखदार, सरमायेदार, बड़े-बड़े व्यवसायी, कारपोरेटस, औद्योगिक घराने,  सब इन बैंकों में जमा सार्वजनिक धन से ऋण लेकर ही चलाये जा रहे हैं। बड़े-बड़े व्यक्तियों को बैंकों के मैनेजर, बड़ी-बड़ी राशि, नियमों को ताक पर रख इन्हें ऋण के रूप में दे देते हैं, वैसे भी हमारी सारी संस्थायें, अमीर व उच्च पद पर आसीन बड़े लोगों के सामने माथा टेकती नजर आती हैं। वित्त विभाग से या मंत्री के एक फोन पर मैनेजरस ऋण दे देते हैं, जबकि बैलंस शीट में वित्तीय तथ्य उसकी आर्थिक स्थिति को विपरीत बयान कर रहे होते हैं। वहीं अगर एक छोटे किसान को ऋण लेना हो तो उसे दस तरह के प्रमाण पत्र लेने होते हैं, यहां तक कि उसे अपने गांव या शहर की अन्य शाखाओं से भी यह प्रमाण पत्र लेना होता कि उसने किसी दूसरे बैंक से ऋण तो नहीं लिया हुआ, जबकि बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यवसायी चाहे तो एक ही बैलंसशीट पर कई बैंकों से ऋण ले सकता हैं, यहां तक कि एक बैंक का ऋण तथा उसका ब्याज अदा करने के लिये दूसरे बंैक से भी ऋण ले सकता है। लब्बो-लुआब यह कि बैंकिग व्यवस्था पूरी तरह से घनाढ्य, बड़े तथा रसूखदार लोगों के प्रति झुकी हुई है तथा वे इस का प्रयोग अपने लिये करते हैं और अब नीरव मोदी, चैकसी, माल्या तथा अन्य बड़े-बड़े टायकून्ज़ ने इसको ‘नकारा कर, खोखला कर’, देश के लिये बड़ा दायित्व-वित्तीय संकट के रूप में खड़ा कर दिया है।  जरा सोच के देखे, किसान रोज आत्महत्याएं कर रहे हैं। आज भी वह पुराने जमाने की तरह साहूकार व महाजन के पंजे में फंसा हुआ है, पुरानी कहावत है कि भारतीय किसान ऋण में जन्म लेता है, ऋण में जीता है और मरने के बाद भी ऋण छोड़ जाता है। सरकार बड़े दावे करती है कि छोटे व सीमान्त किसानों के ऋण माफ कर रही है, वस्तुतः ये ऋण लेने वाले, न तो छोटे किसान, खेती हर मजदूर व सीमान्त कृषक है, अपितु बड़े किसान हैं, जिन्हें बैंकों से ऋण मिलता है। ऋण माफ करना, सरकार की एक राजनैतिक मजबूरी हो सकती है, भले ही करना चाहिये, पर उसका जोर-शोर से विज्ञापन करना, क्या इस प्रवृत्ति को बढ़ावा नहीं देगा कि बैंकों से ऋण लो और फिर उसे वापिस मत करो, क्योंकि अन्ततः सरकार माफ तो कर ही देगी। बड़े-बड़े उद्योगपति जब जनता का पैसा (जो छोटी बचते बैंकों में जमा होती है) उनको तो डकारने के पहले ही आदी हो चुके हैं। अब समाज में नया चलन चलाओ कि उधार लो, मौज करो, पराये पैसे पर ऐश करो, फिर लोन को ‘राईट आफ’ अर्थात बट्टे में डाल दो, बैंक का     एन.पी.ए. बढ़ता है तो अगली सरकार देखेगी। हम कहां जा रहे हैं? किस तरह की प्रवृतियों को समाज में बढ़ावा दे रहे हैं, ऋण माफ करना मजबूरी हो सकती है, पर उसका गुणगान करना, उसे श्रेयस्कर समझना, उसे उपलब्धि मानना, वित्तीय स्थिति को डांवाडोल करना है। अगर ऋण वापिस ही न आयेंगे या लोग साख लेकर वापिस ही न करेंगे तो बैंकिग व्यवस्था आज नहीं तो कल धराशायी होनी ही है। इस रवैये के चलते सुदृढ़ बैंकिग नियमों तथा बैंकिग व्यवहार में सुधार लाना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी है। यहां अन्त में, भावों को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है ‘‘पहले ही माहौल में रूमानियत कम न थी, तेरे कलाम ने दीवाना बना दिया’’।

                                 डा.क.कली

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